भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 395

उस उञ्छवृत्तिवाले द्विजने देखा कि ब्राह्मण अतिथि तो अब भी भूखे ही रह गये हैं। तब वे उसके लिये आहारका चिन्तन करने लगे कि यह ब्राह्मण कैसे संतुष्ट हो? ॥ ४१ ॥ तस्य भार्याब्रवीद् वाक्यं मद्भागो दीयतामिति । गच्छत्वेष यथाकामं परितुष्टो द्विजोत्तमः ॥ ४२ ॥ तब ब्राह्मणकी पत्नीने कहा—'नाथ! यह मेरा भाग इन्हें दे दीजिये, जिससे ये ब्राह्मणदेवता इच्छानुसार तृप्तिलाभ करके यहाँसे पधारें' ॥ ४२ ॥ इति ब्रुवन्तीं तां साध्वीं भार्यां स द्विजसत्तमः । क्षुधापरिगतां ज्ञात्वा तान् सक्तून् नाभ्यनन्दत ॥ ४३ ॥ अपनी पतिव्रता पत्नीकी यह बात सुनकर उन द्विजश्रेष्ठने उसे भूखी जानकर उसके दिये हुए सत्तूको लेनेकी इच्छा नहीं की ॥ ४३ ॥ आत्मानुमानतो विद्वान् स तु विप्रर्षभस्तदा । जानन् वृद्धां क्षुधार्तां च श्रान्तां ग्लानां तपस्विनीम् ॥ ४४ ॥ त्वगस्थिभूतां वेपन्तीं ततो भार्यामुवाच ह । उन विद्वान् ब्राह्मणशिरोमणिने अपने ही अनुमानसे यह जान लिया कि यह मेरी वृद्धा स्त्री स्वयं भी क्षुधासे कष्ट पा रही है, थकी है और अत्यन्त दुर्बल हो गयी है। इस तपस्विनीके शरीरमें चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया है और यह काँप रही है। उसकी अवस्थापर दृष्टिपात करके उन्होंने पत्नीसे कहा— ॥ ४४ १/२ ॥ अपि कीटपतङ्गानां मृगाणां चैव शोभने ॥ ४५ ॥ स्त्रियो रक्ष्याश्च पोष्याश्च न त्वेवं वक्तुमर्हसि । 'शोभने! अपनी स्त्रीकी रक्षा और पालन-पोषण करना कीट-पतंग और पशुओंका भी कर्तव्य है; अतः तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ४५ १/२ ॥ अनुकम्प्यो नरः पत्न्या पुष्टो रक्षित एव च ॥ ४६ ॥ 'जो पुरुष होकर भी स्त्रीके द्वारा अपना पालन-पोषण और संरक्षण करता है, वह मनुष्य दयाका पात्र है ॥ ४६ ॥ प्रपतेद् यशसो दीप्तात् स च लोकान् न चाप्नुयात् । धर्मकामार्थकार्याणि शुश्रूषा कुलसंततिः ॥ ४७ ॥ दारेष्वधीनो धर्मश्च पितॄणामात्मनस्तथा । 'वह उज्ज्वल कीर्तिसे भ्रष्ट हो जाता है और उसे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति नहीं होती। धर्म, काम और अर्थ-सम्बन्धी कार्य, सेवा-शुश्रूषा तथा वंशपरम्पराकी रक्षा—ये सब स्त्रीके ही अधीन हैं। पितरोंका तथा अपना धर्म भी पत्नीके ही आश्रित है ॥ ४७ १/२ ॥ न वेत्ति कर्मतो भार्यारक्षणे योऽक्षमः पुमान् ॥ ४८ ॥ अयशो महदाप्नोति नरकांश्चैव गच्छति ।