भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

'जो पुरुष स्त्रीकी रक्षा करना अपना कर्तव्य नहीं मानता अथवा जो स्त्रीकी रक्षा करनेमें असमर्थ है, वह संसारमें महान् अपयशका भागी होता है और परलोकमें जानेपर उसे नरकोंमें गिरना पड़ता है' ।। ४८ १/२ ।। इत्युक्ता सा ततः प्राह धर्मार्थौ नौ समौ द्विज ।। ४९ ।। सक्तुप्रस्थचतुर्भागं गृहाणेमं प्रसीद मे । पतिके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणी बोली—'ब्रह्मन्! हम दोनोंके धर्म और अर्थ समान हैं, अतः आप मुझपर प्रसन्न हों और मेरे हिस्सेका यह पावभर सत्तू ले लें (और लेकर इसे अतिथिको दे दें) ।। ४९ १/२ ।। सत्यं रतिश्च धर्मश्च स्वर्गश्च गुणनिर्जितः ।। ५० ।। स्त्रीणां पतिसमाधीनं कांक्षितं च द्विजर्षभ । 'द्विजश्रेष्ठ! स्त्रियोंका सत्य, धर्म, रति, अपने गुणोंसे मिला हुआ स्वर्ग तथा उनकी सारी अभिलाषा पतिके ही अधीन है ।। ५० १/२ ।। ऋतुर्मातुः पितुर्बीजं दैवतं परमं पतिः ।। ५१ ।। भर्तुः प्रसादान्नारीणां रतिपुत्रफलं तथा । 'माताका रज और पिताका वीर्य—इन दोनोंके मिलनेसे ही वंशपरम्परा चलती है। स्त्रीके लिये पति ही सबसे बड़ा देवता है। नारियोंको जो रति और पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है, वह पतिका ही प्रसाद है ।। ५१ १/२ ।। पालनाद्धि पतिस्त्वं मे भर्तासि भरणाच्च मे ।। ५२ ।। पुत्रप्रदानाद् वरदस्तस्मात् सक्तून् प्रयच्छ मे । आप पालन करनेके कारण मेरे पति, भरण-पोषण करनेसे भर्ता और पुत्र प्रदान करनेके कारण वरदाता हैं, इसलिये मेरे हिस्सेका सत्तू अतिथिदेवताको अर्पण कीजिये ।। ५२ १/२ ।। जरापरिगतो वृद्धः क्षुधार्तो दुर्बलो भृशम् ।। ५३ ।। उपवासपरिश्रान्तो यदा त्वमपि कर्शितः । 'आप भी तो जराजीर्ण, वृद्ध, क्षुधातुर, अत्यन्त दुर्बल, उपवाससे थके हुए और क्षीणकाय हो रहे हैं। (फिर आप जिस तरह भूखका कष्ट सहन करते हैं, उसी प्रकार मैं भी सह लूँगी)' ।। ५३ १/२ ।। इत्युक्तः स तया सक्तून् प्रगृह्येदं वचोऽब्रवीत् ।। ५४ ।। द्विज सक्तूनिमान् भूयः प्रतिगृह्णीष्व सत्तम । पत्नीके ऐसा कहनेपर ब्राह्मणने सत्तू लेकर अतिथिसे कहा—'साधुपुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! आप यह सत्तू भी पुनः ग्रहण कीजिये' ।। ५४ १/२ ।। स तान् प्रगृह्य भुक्त्वा च न तुष्टिमगमद् द्विजः ।