भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

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कर्शितों सुव्रताचारे क्षुधाविह्वलचेतसम् ॥ ७२ ॥ कथं सक्तून् ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातकः । कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ७३ ॥ श्वशुरने कहा—बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है—शिथिल होता जा रहा है। तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो। क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है। तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ। ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा। अतः कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ७२-७३ ॥ षष्ठे काले व्रतवतीं शौचशीलतपोऽन्विताम् । कृच्छ्रवृत्तिं निराहारां द्रक्ष्यामि त्वां कथं शुभे ॥ ७४ ॥ तुम प्रतिदिन शौच, सदाचार और तपस्यामें संलग्न रहकर छठे कालमें भोजन करनेका व्रत लिये हुए हो। शुभे! बड़ी कठिनाईसे तुम्हारी जीविका चलती है। आज सत्तू लेकर तुम्हें निराहार कैसे देख सकूँगा ॥ ७४ ॥ बाला क्षुधार्ता नारी च रक्ष्या त्वं सततं मया । उपवासपरिश्रान्ता त्वं हि बान्धवनन्दिनी ॥ ७५ ॥ एक तो तुम अभी बालिका हो, दूसरे भूखसे पीड़ित हो रही हो, तीसरे नारी हो और चौथे उपवास करते-करते अत्यन्त दुबली हो गयी हो; अतः मुझे सदा तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि तुम अपनी सेवाओंद्वारा बान्धवजनोंको आनन्दित करनेवाली हो ॥ ७५ ॥ स्नुषोवाच गुरोर्मम गुरुस्त्वं वै यतो दैवतदैवतम् । देवातिदेवस्तस्मात् त्वं सक्तूनादत्स्व मे प्रभो ॥ ७६ ॥ पुत्रवधू बोली—भगवन्! आप मेरे गुरुके भी गुरु, देवताओंके भी देवता और सामान्य देवताकी अपेक्षा भी अतिशय उत्कृष्ट देवता हैं, अतः मेरा दिया हुआ यह सत्तू स्वीकार कीजिये ॥ ७६ ॥ देहः प्राणश्च धर्मश्च शुश्रूषार्थमिदं गुरोः । तव विप्र प्रसादेन लोकान् प्राप्स्यामहे शुभान् ॥ ७७ ॥ मेरा यह शरीर, प्राण और धर्म—सब कुछ बड़ोंकी सेवाके लिये ही है। विप्रवर! आपके प्रसादसे मुझे उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ७७ ॥ अवेक्ष्या इति कृत्वाहं दृढभक्तेति वा द्विज । चिन्त्या ममेयमिति वा सक्तूनादातुमर्हसि ॥ ७८ ॥