अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतः आप मुझे अपना दृढ़ भक्त, रक्षणीय और विचारणीय मानकर अतिथिको देनेके लिये यह सत्तू स्वीकार कीजिये ॥ ७८ ॥ श्वशुर उवाच अनेन नित्यं साध्वी त्वं शीलवृत्तेन शोभसे । या त्वं धर्मव्रतोपेता गुरुवृत्तिमवेक्षसे ॥ ७९ ॥ तस्मात् सक्तून् ग्रहीष्यामि वधु नार्हसि वञ्चनाम् । गणयित्वा महाभागे त्वां हि धर्मभृतां वरे ॥ ८० ॥ श्वशुरने कहा—बेटी! तुम सती-साध्वी नारी हो और सदा ऐसे ही शील एवं सदाचारका पालन करनेसे तुम्हारी शोभा है। तुम धर्म तथा व्रतके आचरणमें संलग्न होकर सर्वदा गुरुजनोंकी सेवापर ही दृष्टि रखती हो; इसलिये बहू! मैं तुम्हें पुण्यसे वंचित न होने दूँगा। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाभागे! पुण्यात्माओंमें तुम्हारी गिनती करके मैं तुम्हारा दिया हुआ सत्तू अवश्य स्वीकार करूँगा ॥ ७९-८० ॥ इत्युक्त्वा तानुपादाय सक्तून् प्रादाद् द्विजातये । ततस्तुष्टोऽभवद् विप्रस्तस्य साधोर्महात्मनः ॥ ८१ ॥ ऐसा कहकर ब्राह्मणने उसके हिस्सेका भी सत्तू लेकर अतिथिको दे दिया। इससे वह ब्राह्मण उन उञ्छवृत्तिधारी साधु महात्मापर बहुत संतुष्ट हुआ ॥ ८१ ॥ प्रीतात्मा स तु तं वाक्यमिदमाह द्विजर्षभम् । वाग्मी तदा द्विजश्रेष्ठो धर्मः पुरुषविग्रहः ॥ ८२ ॥ वास्तवमें उस श्रेष्ठ द्विजके रूपमें मानव-विग्रहधारी साक्षात् धर्म ही वहाँ उपस्थित थे। वे प्रवचनकुशल धर्म संतुष्टचित्त होकर उन उञ्छवृत्तिधारी श्रेष्ठ ब्राह्मणसे इस प्रकार बोले — ॥ ८२ ॥ शुद्धेन तव दानेन न्यायोपात्तेन धर्मतः । यथाशक्ति विसृष्टेन प्रीतोऽस्मि द्विजसत्तम । अहो दानं घुष्यते ते स्वर्गे स्वर्गनिवासिभिः ॥ ८३ ॥ ‘द्विजश्रेष्ठ! तुमने अपनी शक्तिके अनुसार धर्मपूर्वक जो न्यायोपार्जित शुद्ध अन्नका दान दिया है, इससे तुम्हारे ऊपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अहो! स्वर्गलोकमें निवास करनेवाले देवता भी वहाँ तुम्हारे दानकी घोषणा करते हैं ॥ ८३ ॥ गगनात् पुष्पवर्षं च पश्येदं पतितं भुवि । सुरर्षिदेवगन्धर्वा ये च देवपुरःसराः ॥ ८४ ॥ स्तुवन्तो देवदूताश्च स्थिता दानेन विस्मिताः ।