अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'देखो, आकाशसे भूतलपर यह फूलोंकी वर्षा हो रही है। देवर्षि, देवता, गन्धर्व तथा और भी जो देवताओंके अग्रणी पुरुष हैं, वे और देवदूतगण तुम्हारे दानसे विस्मित हो तुम्हारी स्तुति करते हुए खड़े हैं ॥ ८४ १/२ ॥ ब्रह्मर्षयो विमानस्था ब्रह्मलोकचराश्च ये ॥ ८५ ॥ काङ्क्षन्ते दर्शनं तुभ्यं दिवं व्रज द्विजर्षभ । 'द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मलोकमें विचरनेवाले जो ब्रह्मर्षिगण विमानोंमें रहते हैं, वे भी तुम्हारे दर्शनकी इच्छा रखते हैं; इसलिये तुम स्वर्गलोकमें चलो ॥ ८५ १/२ ॥ पितृलोकगताः सर्वे तारिताः पितरस्त्वया ॥ ८६ ॥ अनागताश्च बहवः सुबहूनि युगान्युत । 'तुमने पितृलोकमें गये हुए अपने समस्त पितरोंका उद्धार कर दिया। अनेक युगोंतक भविष्यमें होनेवाली जो संतानें हैं, वे भी तुम्हारे पुण्य-प्रतापसे तर जायँगी' ॥ ८६ १/२ ॥ ब्रह्मचर्येण दानेन यज्ञेन तपसा तथा ॥ ८७ ॥ असंकरेण धर्मेण तस्माद् गच्छ दिवं द्विज । 'अतः ब्रह्मन्! तुम अपने ब्रह्मचर्य, दान, यज्ञ, तप तथा संकरतारहित धर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकमें चलो ॥ ८७ १/२ ॥ श्रद्धया परया यस्त्वं तपश्चरसि सुव्रत ॥ ८८ ॥ तस्माद् देवाश्च दानेन प्रीता ब्राह्मणसत्तम । 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणशिरोमणे! तुम उत्तम श्रद्धाके साथ तपस्या करते हो; इसलिये देवता तुम्हारे दानसे अत्यन्त संतुष्ट हैं ॥ ८८ १/२ ॥ सर्वमेतद्धि यस्मात् ते दत्तं शुद्धेन चेतसा ॥ ८९ ॥ कृच्छ्रकाले ततः स्वर्गो विजितः कर्मणा त्वया । 'इस प्राण-संकटके समय भी यह सब सत्तू तुमने शुद्ध हृदयसे दान किया है; इसलिये तुमने उस पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर ली है ॥ ८९ १/२ ॥ क्षुधा निर्णुदति प्रज्ञां धर्मबुद्धिं व्यपोहति ॥ ९० ॥ क्षुधापरिगतज्ञानो धृतिं त्यजति चैव ह । बुभुक्षां जयते यस्तु स स्वर्गं जयते ध्रुवम् ॥ ९१ ॥ 'भूख मनुष्यकी बुद्धिको चौपट कर देती है। धार्मिक विचारको मिटा देती है। क्षुधासे ज्ञान लुप्त हो जानेके कारण मनुष्य धीरज खो देता है। जो भूखको जीत लेता है, वह निश्चय ही स्वर्गपर विजय पाता है ॥ ९०-९१ ॥ यदा दानरुचिः स्याद् वै तदा धर्मो न सीदति । अन्वेक्ष्य सुतस्नेहं कलत्रस्नेहमेव च ॥ ९२ ॥ धर्ममेव गुरुं ज्ञात्वा तृष्णा न गणिता त्वया ।