भारतकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 421 में से

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पृष्ठ 403

'जब मनुष्यमें दानविषयक रुचि जाग्रत् होती है, तब उसके धर्मका ह्रास नहीं होता। तुमने पत्नीके प्रेम और पुत्रके स्नेहपर भी दृष्टिपात न करके धर्मको ही श्रेष्ठ माना है और उसके सामने भूख-प्यासको भी कुछ नहीं गिना है ॥ ९२ १/२ ॥ द्रव्यागमो नृणां सूक्ष्मः पात्रे दानं ततः परम् ॥ ९३ ॥ कालः परतरो दानाच्छ्रद्धा चैव ततः परा । स्वर्गद्वारं सुसूक्ष्मं हि नरैर्मोहान्न दृश्यते ॥ ९४ ॥ 'मनुष्यके लिये सबसे पहले न्यायपूर्वक धनकी प्राप्तिका उपाय जानना ही सूक्ष्म विषय है। उस धनको सत्पात्रकी सेवामें अर्पण करना उससे भी श्रेष्ठ है। साधारण समयमें दान देनेकी अपेक्षा उत्तम समयपर दान देना और भी अच्छा है; किंतु श्रद्धाका महत्त्व कालसे भी बढ़कर है। स्वर्गका दरवाजा अत्यन्त सूक्ष्म है। मनुष्य मोहवश उसे देख नहीं पाते हैं ॥ ९३-९४ ॥ स्वर्गार्गलं लोभबीजं रागगुप्तं दुरासदम् । तं तु पश्यन्ति पुरुषा जितक्रोधा जितेन्द्रियाः ॥ ९५ ॥ ब्राह्मणास्तपसा युक्ता यथाशक्ति प्रदायिनः । 'उस स्वर्गद्वारकी जो अर्गला (किल्ली) है, वह लोभरूपी बीजसे बनी हुई है। वह द्वार रागके द्वारा गुप्त है, इसीलिये उसके भीतर प्रवेश करना बहुत ही कठिन है। जो लोग क्रोधको जीत चुके हैं, इन्द्रियोंको वशमें कर चुके हैं, वे यथाशक्ति दान देनेवाले तपस्वी ब्राह्मण ही उस द्वारको देख पाते हैं ॥ ९५ १/२ ॥ सहस्रशक्तिश्च शतं शतशक्तिर्दशापि च ॥ ९६ ॥ दद्यादपश्च यः शक्त्या सर्वे तुल्यफलाः स्मृताः । 'श्रद्धापूर्वक दान देनेवाले मनुष्यमें यदि एक हजार देनेकी शक्ति हो तो वह सौका दान करे, सौ देनेकी शक्तिवाला दसका दान करे तथा जिसके पास कुछ न हो, वह यदि अपनी शक्तिके अनुसार जल ही दान कर दे तो इन सबका फल बराबर माना गया है ॥ ९६ १/२ ॥ रन्तिदेवो हि नृपतिरपः प्रादादकिंचनः ॥ ९७ ॥ शुद्धेन मनसा विप्र नाकपृष्ठं ततो गतः । 'विप्रवर! कहते हैं, राजा रन्तिदेवके पास जब कुछ भी नहीं रह गया, तब उन्होंने शुद्ध हृदयसे केवल जलका दान किया था। इससे वे स्वर्गलोकमें गये थे ॥ ९७ १/२ ॥ न धर्मः प्रीयते तात दानैर्दत्तैर्महाफलैः ॥ ९८ ॥ न्यायलब्धैर्यथा सूक्ष्मैः श्रद्धापूतैः स तुष्यति । 'तात! अन्यायपूर्वक प्राप्त हुए द्रव्यके द्वारा महान् फल देनेवाले बड़े-बड़े दान करनेसे धर्मको उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी न्यायोपार्जित थोड़े-से अन्नका भी श्रद्धापूर्वक दान करनेसे उन्हें प्रसन्नता होती है ॥ ९८ १/२ ॥

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