अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनत्रिंशोऽध्यायः परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । कार्तवीर्यस्य संवादं समुद्रस्य च भाविनि ॥ १ ॥ ब्राह्मणने कहा—भामिनि! इस विषयमें भी कार्तवीर्य और समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १ ॥ कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान् । येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही ॥ २ ॥ पूर्वकालमें कार्तवीर्य अर्जुनके नामसे प्रसिद्ध एक राजा था, जिसकी एक हजार भुजाएँ थीं। उसने केवल धनुष-बाणकी सहायतासे समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको अपने अधिकारमें कर लिया था ॥ २ ॥ स कदाचित् समुद्रान्ते विचरन् बलदर्पितः । अवाकिरन् शरशतैः समुद्रमिति नः श्रुतम् ॥ ३ ॥ सुना जाता है, एक दिन राजा कार्तवीर्य समुद्रके किनारे विचर रहा था। वहाँ उसने अपने बलके घमण्डमें आकर सैकड़ों बाणोंकी वर्षासे समुद्रको आच्छादित कर दिया ॥ ३ ॥ तं समुद्रो नमस्कृत्य कृताञ्जलिरुवाच ह । मा मुञ्च वीर नाराचान् ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ४ ॥ मदाश्रयाणि भूतानि त्वद्विसृष्टैर्महेषुभिः । वध्यन्ते राजशार्दूल तेभ्यो देह्यभयं विभो ॥ ५ ॥ तब समुद्रने प्रकट होकर उसके आगे मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर कहा —‘वीरवर! राजसिंह! मुझपर बाणोंकी वर्षा न करो। बोलो, तुम्हारी किस आज्ञाका पालन करूँ? शक्तिशाली नरेश्वर! तुम्हारे छोड़े हुए इन महान् बाणोंसे मेरे अन्दर रहनेवाले प्राणियोंकी हत्या हो रही है। उन्हें अभय दान करो' ॥ ४-५ ॥ अर्जुन उवाच मत्समो यदि संग्रामे शरासनधरः क्वचित् । विद्यते तं समाचक्ष्व यः समासीत मां मृधे ॥ ६ ॥