अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतमेवंवादिनं पार्थ शिष्यं गुरुरुवाच ह । सर्वं तु ते प्रवक्ष्यामि यत्र वै संशयो द्विज ॥ ५ ॥ पार्थ! इस प्रकार कहनेवाले उस शिष्यसे गुरु बोले—‘विप्र! तुम्हारा जिस विषयमें संशय है, वह सब मैं तुम्हें बताऊँगा’ ॥ ५ ॥ इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठ गुरुणा गुरुवत्सलः । प्राञ्जलिः परिपप्रच्छ यत्तच्छृणु महामते ॥ ६ ॥ महाबुद्धिमान् कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! गुरुके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर उस गुरुके प्यारे शिष्यने हाथ जोड़कर जो कुछ पूछा, उसे सुनो ॥ ६ ॥ शिष्य उवाच कुतश्चाहं कुतश्च त्वं तत्सत्यं ब्रूहि यत्परम् । कुतो जातानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ७ ॥ शिष्य बोला—विप्रवर! मैं कहाँसे आया हूँ और आप कहाँसे आये हैं? जगत्के चराचर जीव कहाँसे उत्पन्न हुए हैं? जो परमतत्त्व है, उसे आप यथार्थरूपसे बताइये ॥ ७ ॥ केन जीवन्ति भूतानि तेषामायुश्च किं परम् ।