अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिं सत्यं किं तपो विप्र के गुणाः सद्भि रीरिताः ॥ ८ ॥ विप्रवर! सम्पूर्ण जीव किससे जीवन धारण करते हैं? उनकी अधिक-से-अधिक आयु कितनी है? सत्य और तप क्या है? सत्पुरुषोंने किन गुणोंकी प्रशंसा की है? ॥ ८ ॥ के पन्थानः शिवाश्च स्युः किं सुखं किं च दुष्कृतम् । एतान् मे भगवन् प्रश्नान् याथातथ्येन सुव्रत ॥ ९ ॥ वक्तुमर्हसि विप्रर्षे यथावदिह तत्त्वतः । त्वदन्यः कश्चन प्रश्नानेतान् वक्तुमिहार्हति ॥ १० ॥ ब्रूहि धर्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं मम । मोक्षधर्मार्थकुशलो भवाँल्लोकेषु गीयते ॥ ११ ॥ कौन-कौन-से मार्ग कल्याण करनेवाले हैं? सर्वोत्तम सुख क्या है? और पाप किसे कहते हैं? श्रेष्ठ व्रतका आचरण करनेवाले गुरुदेव! मेरे इन प्रश्नोंका आप यथार्थरूपसे उत्तर देनेमें समर्थ हैं। धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! यह सब जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है। इस विषयमें इन प्रश्नोंका तत्त्वतः यथार्थ उत्तर देनेमें आपसे अतिरिक्त दूसरा कोई समर्थ नहीं है। अतः आप ही बतलाइये; क्योंकि संसारमें मोक्षधर्मोंके तत्त्वके ज्ञानमें आप कुशल बताये गये हैं ॥ ९—११ ॥ सर्वसंशयरांश्छेत्ता त्वदन्यो न च विद्यते । संसारभीरवश्चैव मोक्षकामास्तथा वयम् ॥ १२ ॥ हम संसारसे भयभीत और मोक्षके इच्छुक हैं। आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं, जो सब प्रकारकी शंकाओंका निवारण कर सके ॥ १२ ॥ वासुदेव उवाच तस्मै सम्प्रतिपन्नाय यथावत् परिपृच्छते । शिष्याय गुणयुक्ताय शान्ताय प्रियवर्तिने ॥ १३ ॥ छायाभूताय दान्ताय यतते ब्रह्मचारिणे । तान् प्रश्नानब्रवीत् पार्थ मेधावी स धृतव्रतः । गुरुः कुरुकुलश्रेष्ठ सम्यक् सर्वानरिंदम ॥ १४ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कहा—कुरुकुलश्रेष्ठ शत्रुदमन अर्जुन! वह शिष्य सब प्रकारसे गुरुकी शरणमें आया था। यथोचित रीतिसे प्रश्न करता था। गुणवान् और शान्त था। छायाकी भाँति साथ रहकर गुरुका प्रिय करता था तथा जितेन्द्रिय, संयमी और ब्रह्मचारी था। उसके पूछनेपर मेधावी एवं व्रतधारी गुरुने पूर्वोक्त सभी प्रश्नोंका ठीक-ठीक उत्तर दिया ॥ १३-१४ ॥ गुरुरुवाच ब्रह्मणोक्तमिदं सर्वमृषिप्रवरसेवितम् ।