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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

'दिव्य अप्सराओंके समुदाय, गन्धर्व, किन्नर, विश्वावसु तथा जो अन्य प्रमुख गन्धर्व हैं, वे सब यहाँ आकर मेरे यज्ञकी उपासना करें ।। २५ १/२ ।। उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च यत् किंचिद् वसु विद्यते ।। २६ ।। सर्वं तदिह यज्ञेषु स्वयमेवोपतिष्ठतु । स्वर्गः स्वर्गसदश्चैव धर्मश्च स्वयमेव तु ।। २७ ।। ‘उत्तर कुरुवर्षमें जो कुछ धन है, वह सब स्वयं यहाँ मेरे यज्ञोंमें उपस्थित हो। स्वर्ग, स्वर्गवासी देवता और धर्म स्वयं यहाँ विराजमान हो जायें' ।। २६-२७ ।। इत्युक्ते सर्वमेवैतदभवत् तपसा मुनेः । तस्य दीप्ताग्निमहसस्त्वगस्त्यस्यातितेजसः ।। २८ ।। प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, अतिशय कान्तिमान् महर्षि अगस्त्यके इतना कहते ही उनकी तपस्याके प्रभावसे ये सारी वस्तुएँ वहाँ प्रस्तुत हो गयीं ।। २८ ।। ततस्ते मुनयो हृष्टा ददृशुस्तपसो बलम् । विस्मिता वचनं प्राहुरिदं सर्वे महार्थवत् ।। २९ ।। उन महर्षियोंने बड़े हर्षके साथ महर्षिके उस तपोबलको प्रत्यक्ष देखा। देखकर वे सब लोग आश्चर्यचकित हो गये और इस प्रकार महान् अर्थसे भरे हुए वचन बोले ।। २९ ।। ऋषय ऊचुः प्रीताः स्म तव वाक्येन न त्विच्छामस्तपोव्ययम् । तैरेव यज्ञैस्तुष्टाः स्म न्यायेनेच्छामहे वयम् ।। ३० ।। ऋषि बोले—महर्षे! आपकी बातोंसे हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। हम आपकी तपस्याका व्यय होना नहीं चाहते हैं। हम आपके उन्हीं यज्ञोंसे संतुष्ट हैं और न्यायसे उपार्जित अन्नकी ही इच्छा रखते हैं ।। ३० ।। यज्ञं दीक्षां तथा होमान् यच्चान्यन्मृगयामहे । न्यायेनोपार्जिताहाराः स्वकर्माभिरता वयम् ।। ३१ ।। यज्ञ, दीक्षा, होम तथा और जो कुछ हम खोजा करते हैं, वह सब हमें यहाँ प्राप्त है। न्यायसे उपार्जित किया हुआ अन्न ही हमारा भोजन है और हम सदा अपने कर्मोंमें लगे रहते हैं ।। ३१ ।। वेदांश्च ब्रह्मचर्येण न्यायतः प्रार्थयामहे । न्यायेनोत्तरकालं च गृहेभ्यो निःसृता वयम् ।। ३२ ।। हम ब्रह्मचर्यका पालन करके न्यायतः वेदोंको प्राप्त करना चाहते हैं और अन्तमें न्यायपूर्वक ही हम घर छोड़कर निकले हैं ।। ३२ ।। धर्मदृष्टैर्विधिद्वारैस्तपस्तप्स्यामहे वयम् । भवतः सम्यगिष्टा तु बुद्धिर्हिंसाविवर्जिता ।। ३३ ।।

एतामहिंसां यज्ञेषु ब्रूयास्त्वं सततं प्रभो । प्रीतास्ततो भविष्यामो वयं तु द्विजसत्तम ॥ ३४ ॥ विसर्जिताः समाप्तौ च सत्रादस्माद् व्रजामहे । धर्मशास्त्रमें देखे गये विधि-विधानसे ही हम तपस्या करेंगे। आपको हिंसारहित बुद्धि ही अधिक प्रिय है; अतः प्रभो! आप यज्ञोंमें सदा इस अहिंसाका ही प्रतिपादन करें। द्विजश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे हम आपपर बहुत प्रसन्न होंगे। यज्ञकी समाप्ति होनेपर जब आप हमें विदा करेंगे, तब हम यहाँसे अपने घरको जायँगे ।। ३३-३४ १/२ ।। तथा कथयतां तेषां देवराजः पुरंदरः ।। ३५ ।। ववर्ष सुमहातेजा दृष्ट्वा तस्य तपोबलम् । आसमाप्तेश्च यज्ञस्य तस्यामितपराक्रमः ।। ३६ ।। निकामवर्षी पर्जन्यो बभूव जनमेजय । जनमेजय! जब ऋषि लोग ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महा तेजस्वी देवराज इन्द्रने महर्षिका तपोबल देखकर पानी बरसाना आरम्भ किया। जबतक उस यज्ञकी समाप्ति नहीं हुई, तबतक अमितपराक्रमी इन्द्रने वहाँ इच्छानुसार वर्षा की ।। ३५-३६ १/२ ।। प्रसादयामास च तमगस्त्यं त्रिदशेश्वरः । स्वयमभ्येत्य राजर्षे पुरस्कृत्य बृहस्पतिम् ।। ३७ ।। राजर्षे! देवेश्वर इन्द्रने स्वयं आकर बृहस्पतिको आगे करके अगस्त्य ऋषिको मनाया ।। ३७ ।। ततो यज्ञसमाप्तौ तान् विससर्ज महामुनीन् । अगस्त्यः परमप्रीतः पूजयित्वा यथाविधि ।। ३८ ।। तदनन्तर यज्ञ समाप्त होनेपर अत्यन्त प्रसन्न हुए अगस्त्यजीने उन महामुनियोंकी विधिवत् पूजा करके सबको विदा कर दिया ।। ३८ ।। जनमेजय उवाच कोऽसौ नकुलरूपेण शिरसा काञ्चनेन वै । प्राह मानुषवद् वाचमेतत् पृष्टो वदस्व मे ।। ३९ ।। जनमेजयने पूछा—मुने! सोनेके मस्तकसे युक्त वह नेवला कौन था, जो मनुष्योंकी- सी बोली बोलता था? मेरे इस प्रश्नका मुझे उत्तर दीजिये ।। ३९ ।। वैशम्पायन उवाच एतत् पूर्वं न पृष्टोऽहं न चास्माभिः प्रभाषितम् । श्रूयतां नकुलो योऽसौ यथा वाक् तस्य मानुषी ।। ४० ।। वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! यह बात न तो तुमने पहले पूछी थी और न मैंने बतायी थी। अब पूछते हो तो सुनो। वह नकुल कौन था और उसकी मनुष्योंकी-सी बोली

कैसे हुई, यह सब बता रहा हूँ ॥ ४० ॥ श्राद्धं संकल्पयामास जमदग्निः पुरा किल । होमधेनुस्तमागाच्च स्वयमेव दुदोह ताम् ॥ ४१ ॥ पूर्वकालकी बात है, एक दिन जमदग्नि ऋषिने श्राद्ध करनेका संकल्प किया। उस समय उनकी होमधेनु स्वयं ही उनके पास आयी और मुनिने स्वयं ही उसका दूध दुहा ॥ ४१ ॥ तत् पयः स्थापयामास नवे भाण्डे दृढे शुचौ । तच्च क्रोधस्वरूपेण पिठरं धर्म आविशत् ॥ ४२ ॥ उस दूधको उन्होंने नये पात्रमें, जो सुदृढ़ और पवित्र था, रख दिया। उस पात्रमें धर्मने क्रोधका रूप धारण करके प्रवेश किया ॥ ४२ ॥ जिज्ञासुस्तमृषिश्रेष्ठं किं कुर्याद् विप्रिये कृते । इति संचिन्त्य धर्मः स धर्षयामास तत् पयः ॥ ४३ ॥ धर्म उन मुनिश्रेष्ठकी परीक्षा लेना चाहते थे। उन्होंने सोचा, देखूँ तो ये अप्रिय करनेपर क्या करते हैं? इसीलिये उन्होंने उस दूधको क्रोधके स्पर्शसे दूषित कर दिया ॥ ४३ ॥ तमाज्ञाय मुनिः क्रोधं नैवास्य स चुकोप ह । स तु क्रोधस्ततो राजन् ब्राह्मणीं मूर्तिमास्थितः । जिते तस्मिन् भृगुश्रेष्ठमभ्यभाषदमर्षणः ॥ ४४ ॥ राजन्! मुनिने उस क्रोधको पहचान लिया; किंतु उसपर वे कुपित नहीं हुए। तब क्रोधने ब्राह्मणका रूप धारण किया। मुनिके द्वारा पराजित होनेपर उस अमर्षशील क्रोधने उन भृगुश्रेष्ठसे कहा— ॥ ४४ ॥ जितोऽस्मीति भृगुश्रेष्ठ भृगवो ह्यतिरोषणाः । लोके मिथ्या प्रवाडोऽयं यत्त्वयास्मि विनिर्जितः ॥ ४५ ॥ 'भृगुश्रेष्ठ! मैं तो पराजित हो गया। मैंने सुना था कि भृगुवंशी ब्राह्मण बड़े क्रोधी होते हैं; परंतु लोकमें प्रचलित हुआ यह प्रवाद आज मिथ्या सिद्ध हो गया; क्योंकि आपने मुझे जीत लिया ॥ ४५ ॥ वशे स्थितोऽहं त्वय्यद्य क्षमावति महात्मनि । बिभेमि तपसः साधो प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ ४६ ॥ 'प्रभो! आज मैं आपके वशमें हूँ। आपकी तपस्यासे डरता हूँ। साधो! आप क्षमाशील महात्मा हैं, मुझपर कृपा कीजिये' ॥ ४६ ॥ जमदग्निरुवाच साक्षाद् दृष्टोऽसि मे क्रोध गच्छ त्वं विगतज्वरः । न त्वयापकृतं मेऽद्य न च मे मन्युरस्ति वै ॥ ४७ ॥

जमदग्नि बोले—क्रोध! मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष देखा है। तुम निश्चिन्त होकर यहाँसे जाओ। तुमने मेरा कोई अपराध नहीं किया है; अतः आज तुमपर मेरा रोष नहीं है ।। ४७ ।। यान् समुद्दिश्य संकल्पः पयसोऽस्य कृतो मया । पितरस्ते महाभागास्तेभ्यो बुद्धयस्व गम्यताम् ।। ४८ ।। मैंने जिन पितरोंके उद्देश्यसे इस दूधका संकल्प किया था, वे महाभाग पितर ही उसके स्वामी हैं। जाओ, उन्हींसे इस विषयमें समझो ।। ४८ ।। इत्युक्तो जातसंत्रासस्तत्रैवान्तरधीयत । पितॄणामभिषङ्गाच्च नकुलत्वमुपागतः ।। ४९ ।। मुनिके ऐसा कहनेपर क्रोधरूपधारी धर्म भयभीत हो वहाँसे अदृश्य हो गये और पितरोंके शापसे उन्हें नेवला होना पड़ा ।। ४९ ।। स तान् प्रसादयामास शापस्यान्तो भवेदिति । तैश्चाप्युक्तः क्षिपन् धर्मं शापस्यान्तमवाप्स्यसि ।। ५० ।। इस शापका अन्त होनेके उद्देश्यसे उन्होंने पितरोंको प्रसन्न किया। तब पितरोंने कहा —'तुम धर्मराज युधिष्ठिरपर आक्षेप करके इस शापसे छुटकारा पा जाओगे' ।। ५० ।। तैश्चोक्तो यज्ञियान् देशान् धर्मारण्यं तथैव च । जुगुप्समानो धावन् स तं यज्ञं समुपासदत् ।। ५१ ।। उन्होंने ही उस नेवलेको यज्ञसम्बन्धी स्थान और धर्मारण्यका पता बताया था। वह धर्मराजकी निन्दाके उद्देश्यसे दौड़ता हुआ उस यज्ञमें जा पहुँचा था ।। ५१ ।। धर्मपुत्रमथाक्षिप्य सक्तुप्रस्थेन तेन सः । मुक्तः शापात् ततः क्रोधो धर्मो ह्यासीद् युधिष्ठिरः ।। ५२ ।। धर्मपुत्र युधिष्ठिरपर आक्षेप करते हुए सेरभर सत्तूके दानका माहात्म्य बताकर क्रोधरूपधारी धर्म शापसे मुक्त हो गया और वह धर्मराज युधिष्ठिरमें स्थित हो गया ।। ५२ ।। एवमेतत् तदा वृत्ते यज्ञे तस्य महात्मनः । पश्यतां चापि नस्तत्र नकुलोऽन्तर्हितस्तदा ।। ५३ ।। इस प्रकार महात्मा युधिष्ठिरका यज्ञ समाप्त होनेपर यह घटना घटी थी और वह नेवला हमलोगोंके देखते-देखते वहाँसे गायब हो गया था ।। ५३ ।। १. खाद्य पदार्थको पत्थरपर फोड़कर खानेवाले। २. सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले। ३. पूछकर दिये हुए अन्नको ही लेनेवाले। ४. यज्ञशिष्ट अन्नको ही भोजन करनेवाले। ५. तत्त्वका विचार करनेवाले।

  • संचित अन्नका व्यय किये बिना ही उसके स्पर्शमात्रसे देवताओंको तृप्त करनेकी जो भावना है, उसका नाम स्पर्शयज्ञ है।