अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
द्वादश यम संसार पठैहों। नाम तुम्हार पंथ चलैहों ॥ प्रथम दूत प्रगटे मम जायी। पीछे अंश तुम्हारा आयी ॥ द्वादश पंथ जीव जो ऐहैं। सो हमरे मुख आन समैहैं ॥
निरंजन ने कहा कि आपका कहा मैंने मान लिया, पर एक विनती है कि आप अपना एक पंथ चलाकर जीवों को अमर लोक ले जाना और मैं अपने 12 पंथ चलाकर जीवों को भटकाऊंगा। 12 यम मैं संसार में भेजूंगा, वे आपका नाम लेकर मेरा पंथ चलायेंगे और जो जीव उन पंथों में आ जायेंगे, वे मेरे मुख में ही समायेंगे यानी उन्हें मैं खा जाऊंगा।
साहिब ने कहा
धर्म जस तुम माँगहु सो, चरित्र हम भल चीन्हिया ॥ पंथ द्वादश तुम कहै उसो, अमी घोर विष दीन्हिया ॥ जो मेटि डारों तोहि को अब, पलटि कला दिखावऊँ ॥ लै जीवबंद छुड़ाय यमसो, अमर लोक सिधावऊँ ॥ पुरुष वचन अस नाहिं, यहै सोच चित कीन्है ॥ लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्य शब्द जो दृढ़ गहे ॥
साहिब ने कहा कि मैंने तुम्हारी चालाकी जान ली है, जो तुम माँग रहे हो। अपने 12 पंथ चलाकर अमृत में विष घोल देना चाहते हो। यदि तुमने अब कोई खेल दिखाया तो तुम्हें मिटा दूँगा और सब जीवों को छुड़ाकर अमर लोक ले जाऊंगा, पर अफसोस! परम पुरुष की ऐसी आज्ञा नहीं है, इसलिए जो जीव मेरे नाम को दृढ़ता से पकड़े रहेंगे, उन्हें ही मैं अमर लोक ले जाऊंगा।
निरंजन ने कहा
कहे धर्म जाओ संसारा। आनहु जीव नाम अधारा ॥ जो कोई जैहैं शरण तुम्हारा। हम सिर पग दै होवे पारा ॥
निरंजन ने कहा कि ठीक है, अब संसार में जाओ और जीवों को नाम के सहारे ले जाओ, जो कोई आपकी शरण में आयेगा, वो मेरे शीश पर पैर रखकर पार हो जायेगा।