अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 112, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रेतायुग में साहिब का आगमन
सतयुग गयो त्रेता आवा । नाम मुनींद्र जीव समुझावा ॥ जब आयेउ जीवन उपदेशा । धर्मराय हित भयेउ अँदेशा ॥ इन भवसागर मोर उजारा । जिव लै जाहि पुरुष दरबारा ॥ परबस होय मौन सो गहिया । सोच विचार मनहिं मन रहिया ॥
सतयुग बीतने पर त्रेतायुग में साहिब मुनींद्र जी के नाम से भवसागर में विख्यात हुए, जब जीवों को उपदेश देने लगे तो निरंजन को संदेह हुआ कि यह मेरी दुनिया उजाड़ देंगे, हंसों को परम पुरुष के पास ले जायेंगे।
त्रेतायुग जबही पगु धारा । मृत्यु लोक कीन्हों पैसारा ॥ जीव अनेकन पूछा जाई । यम से को तुहि लेहि छुड़ाई ॥ कहें भरम वश जीव अयाना । हमरा करता पुरुष पुराना ॥ कोई विष्णु महेश की आस लगावें । कोई चण्डी देवी कहैं गावें ॥ जो ग्रासे जिव सेवैं ताही । अनचीन्है यम मुख में जाहीं ॥
जैसे ही त्रेतायुग आया तो साहिब पुनः मृत्यु लोक आए, आकर बहुतों से पूछा कि तुम्हें काल से कौन बचायेगा! तब कोई कहता कि विष्णु जी हमें काल से छुड़ायेंगे, कोई कहता कि शिवजी छुड़ायेंगे, कोई कहता कि चण्डी देवी जी छुड़ायेंगी। भ्रमवश जीव उसी की भक्ति कर रहे थे, जो भक्षण करने वाला था और बिना सत्य की पहचान किये सब काल के मुख में जा रहे थे।
चहुँ दिशि फिरि आयेउँ गढ़ लंका । भाट विचित्र मिल्यो निःसंका ॥ तिनि पुनि पूछेउ मुक्ति संदेशा । तासों कह्यो ज्ञान उपदेशा ॥ सुना विचित्र तबहि भ्रम भागा । अति अधीन है चरणन लागा ॥ कीजै मोहि कृतारथ आजू । मोरे जिवकर कीजे काजू ॥
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