अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
का रूप धारण कर डसेगा, इसलिए मेरा मंत्र याद रखो, काल का जहर नहीं चढ़ेगा। दूसरी बार पुनः काल हंस रूप बनाकर तुम्हें ठगने आयेगा, इसलिए मैं तुम्हें काल का रूप समझा देता हूँ, ताकि तुम उसे पहचान सको। उसका छोटा माथा होगा, काली आखें होंगी, बाकी अंग सफेद होंगे।
रानी चरण गहे तब धायी। हे प्रभु मोहि लोक लै जायी ॥
यह तो देस काल कर थानी। हे प्रभु लै चल देस अमानी ॥
रानी ने कहा कि यह तो काल का देश है, मुझे अपने लोक ले चलो।
तब रानी सों कहेउ बुझाई। बचन हमार सुनो चित लाई ॥
जब लंगि ठे का पूरे आई। तब लग रहो नाम लौ लाई ॥
साहिब ने कहा कि आयु से पहले नहीं ले जाऊँगा तुम्हारा जीव, इसलिए जब तक आयु है, तब तक नाम में लौ लगाए रखो, जब पूरी होगी तो ले जाऊँगा।
गजरूपी है काल, केहरि पुरुष प्रताप है ।
रोक रहो तुम ढाल, काल खडग व्यापे नहीं ॥
साहिब ने कहा कि काल हाथी की तरह है, पर परम पुरुष की नाम सिंह की तरह है, उसकी ढाल होगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा।
इतना कह हम गुप्त छिपाया। तक्षक रूप काल हो आया ॥
जबहीं रात बीती आधी। रानी उठ चली सेवा साथी ॥
सेज आय रानी पौढायी। डसेउ व्याल मस्तक मँह जायी ॥
साहिब रानी को समझाकर गुप्त हो गये और इतने में काल साँप का रूप धारण कर आया। जब आधी रात बीत गयी तो रानी सेवा भक्ति करके अपने विस्तर पर आयी। तब काल ने उसे मस्तक में डस लिया।
इन्द्रमती ने कहा
इन्द्रमती अस वचन सुनायी। तक्षक डसेउ मोहि कहँ आयी ॥
सुन राजा व्याकुल है धावा। गुणी गारुडी वेगि बुलावा ॥