अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 144 में से
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कह इन्द्रमती तब कर जोरी । हे प्रभु सुनो विनती मोरी । चीन्ह परी मोही यम की छाहीं । अब यहि देश रहब हम नाहीं ॥ हे साहिब लै चलु निज देश । इहवाँ बहु काल कलेशा ॥
रानी ने दोनों हाथ जोड़कर विनती की, कहा—मुझे काल की बाधा समझ आ गयी है, इसलिए अब इस देश में नहीं रहूँगी, मुझे अपने देश ले चलो, यहाँ बहुत कष्ट है ।
साहिब कहते हैं
प्रथमहि रानी कीन्हों संग। मेट्यो काल कठिन परसंगा ॥ तबहीं ठीक पूर भराया । ले रानी सत लोक सिधाया ॥ ले पहुँचायो मानसरोवर । जहवाँ कामिनि करहिं कतोहर ॥ अमी सरोवर अमी चखायी । सागर कबीर पाँव परायी ॥ तेहि आगे सुरति को सागर । पहुँची रानी भई उजागर ॥ लोक द्वार ठाढ तब कीनी । देखत रानी अति सुख भीनी ॥ हंस धाय अंकम भर लीन्हा । गावहिं मंगल आरति कीन्हा ॥ सकल हंस कीन्हा सनमाना । धन्य हंस सतगुरु पहिचाना ॥ भल तुम छोड़ेहु काल का फंदा । तुम्हरो कष्ट मिट्यो दुखदंदा ॥ चलो हंस तुम हमरे साथ। पुरुष दरश कर नावहु माथा ॥ इन्द्रमती आवहु संग मोरे । पुरुष दरश होवै अब तोरे ॥ इन्द्रमती अरु हंस मिलाहीं । करहिं कुतूहल मंगल गाहीं ॥ चलत हंस सब अस्तुति लावै । अब तो दरश पुरुष को पावै । तब हम पुरुष सन बिनती लावा । देहु दरश अब हंस ढिग आवा ॥ देहु दरश तिहिं दीनदयाला । बंदीछोर सु होहु कृपाला ॥ बिकस्यो पुहुह उठा अस बानी । सुनहु योग संतायन ज्ञानी ॥ हंसन कहै अब आव लिवाई । दरश कराइ लेउ तुम आई ॥