अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
तबहीं पुरुष वचन परगासा । पुत्री जाहु धरम के पास।।
देहुँ वस्तु सो लेहु सम्हारी । रचहु धर्म मिलि उत्पति वारी ।।
दीन्हो बीज जीव पुनि सोई । नाम सुहँ ग जीव कर होई ।।
जीव सोहँ गम दूसर नाही । जीव सो अंश पुरुष को आही ।।
परम-पुरुष ने अनन्त आत्माएँ देते हुए कहा कि हे पुत्री ! मानसरोवर में निरंजन के पास ये आत्माएँ लेकर जाओ और उसके साथ मिलकर सत्य सृष्टि करो । सोहँ ग जीव का ही नाम है और यह परम-पुरुष का अंश है ।
पुरुष सेवा वश भये तब अष्टगहिँ दीन्ह हो ।
मानसरोवर जाहु कहिया देहु धर्महिँ चीन्ह हो ।
अष्टँ गी कन्या हती जेहिँ रूप शोभा अति बनी ।
जाहु कन्या मानसरोवर करहु रचना अति घनी ।।
सेवा के वश होकर ही परम-पुरुष ने अष्टंगी को जीव देकर निरंजन के पास मानसरोवर में भेजा ।
चौरासी लख जीव, मूल बीज तेहि संग दे ।।
रचना रचहु सजीव, कन्या चलि सिर नाय के ।।
परम-पुरुष ने आद्य-शक्ति को जीवात्माएँ देते हुए कहा कि सत्य सृष्टि करना । (यानी आत्माओं को शरीरों में डालने की आज्ञा नहीं दी) आद्य-शक्ति परम-पुरुष को प्रणाम कर चल पड़ी ।
यह सब दीन्हो आदि कुमारी । मान सरोवर चलि भई नारी ।।
तत्छिन्न पुरुष सहज टेरावा । धावत सहज पुरुष पहिँ आवा ।।
जाही सहज धरम यह कहेहु । दीन्ही वस्तु जस तुम चहे हु ।।
मूल बीज तुम पहुँ पठवावा । करहु सृष्टि जस तुम मन भावा ।।
मानसरोवर जाहि रहाहु । ताते होई हैं सृष्टि उराहु ।।