भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार। मोसन काल कीन्ह अधिकारा ॥ तीन शीश मम भच्छन कीन्हो। हो सतपुरुष दया भल चीन्हो ॥ यही चरित्र पुरुष भल जानी। दीनहो शाप सो कहों बखानी ॥ लच्छ जीव नित ग्रासन करहू। सवा लच्छ नित प्रति बिस्तरहू ॥

परम-पुरुष को ध्यान आया कि इसने पहले भी कूर्म का पेट फाड़कर पाँच तत्व का बीज निकाला था और अब इसने आद्य-शक्ति को निगल लिया है। परम-पुरुष को बुरा लगा, उन्होंने निरंजन को शाप दे दिया, कहा कि एक लाख जीवों को तू रोज़ निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख को उत्पन्न करेगा।

पुनि कीन्ह पुरुष तिवान, तिहि छन मेटि डारो काल हो। कठिन काल कराल जीवन। बहुत करइ बिहाल हो ॥ यहि मेटत सबै मितिहैं, बचन डोल अडोलसां ॥

परम-पुरुष ने विचार किया कि मैं काल पुरुष को मिटा देता हूँ, क्योंकि यह तो जीवों को बड़ा कष्ट देगा, पर फिर ध्यान आया कि मैंने तो इसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है, यदि मिटा दिया तो एक तो मेरा शब्द कट जायेगा और फिर सभी 16 पुत्रों को एक नाल में पियेरा है, यदि एक को मिटाया तो सभी मिट जायेंगे।

डोलै बचन हमार, जो अब मेटा धरम को। वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं ॥

उसे मिटाने से शब्द कट जाता था, इसलिए शाप दिया कि अब मेरे देश में नहीं आ सकेगा, मेरा दर्शन नहीं कर सकेगा।

जोगजीत कहैं तबहि बुलावा। धर्म चरित सब कहि समुझाया ॥ जोगजीत तुम बेगि सिधारो। धर्मराय को मारि निकारो ॥ मानसरोवर रहन न पावै। अब यहि देस काल नहिं आवै ॥ धर्म के उदर माहिं है नारी। तासो कहो निज शब्द सम्हारी ॥

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