अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
सुनिके धर्म क्रोध उर जरे ऊ । जोगजीत सो सन्मुख भिरे ऊ ॥ जोगजीत तब कीन्हें ध्याना । पुरुष प्रताप तेज उर आना ॥ पुरुष आज्ञा भई तेहि काला । मारहु सुरति लिलार कराला ॥ जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा । जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा ॥
यह सुन निरंजन क्रोधित होकर लड़ने के लिए योगजीत के सम्मुख आया। योगजीत ने तब परम-पुरुष का ध्यान करके उनके तेज को लिया और निरंजन पर सुरति फेंकी, जिससे वो बेहोश होकर गिर पड़ा।
गहि भुजा फटकार दीन्हों, परे उ लोक ते न्यार हो ॥ भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठे उ सम्हार हो ॥ निरसि कन्या उदर ते, पुनि देख धर्महि अति डरी ॥ अब नहिं देखों देस वह, कहो कौन विधि कहँवा परी ॥
तब योगजीत ने उसकी भुजा पकड़कर उसे अमर-लोक से नीचे शून्य में फेंक दिया। वहाँ योगजीत के डर से संभल कर उठा और उसके पेट से कन्या बाहर निकल आयी। निरंजन को देख कन्या डरने लगी और सोचने लगी कि यहाँ कैसे आ गयी! अब उस देश में नहीं जा पाऊँगी।
कामिनि रही सकाय, त्रासित काल डर अधिक । रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खड़ी ॥
आद्य शक्ति काल निरंजन से डरने लगी और शीश नवाकर वहीं पास में खड़ी हो गयी।
निरंजन ने कहा
कहे धर्म सुनु आदि कुमारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥ पुरुष रचा तोहि हमरे काजा । इक मति होय करहु उपराजा ॥ हम हैं पुरुष तुमहिं हो नारी । अब जनि डरपो त्रास हमारी ॥
निरंजन ने शक्ति से कहा कि हे कुमारी! मुझसे मत डरो; परम-पुरुष ने तुम्हें मेरे काम के लिए रचा है, इसलिए दोनों मिलकर राज्य करते हैं। मैं पुरुष हूँ और तुम मेरी नारी हो; मुझसे मत डरो।