अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
आपे आप आप निरमाई । काहे न कथन कीन तुम माई ॥ अब मोसन तुम छल जनि करहू । साँचे साँच सब कहि उच्चरहू ॥
ब्रह्मा ने कहा कि माना तुम्हीं ने सब कुछ बनाया, पर यदि ऐसा था तो पहले हमसे क्यों नहीं कहा, छिपाए क्यों रखा और जब वेद मुझसे कह रहा है कि एक पुरुष है, निरंजन है, निराकार है, दिखता नहीं है तो तुम कह रही हो कि मैं ही सब कुछ हूँ, सब कुछ मैंने ही रचा है । अच्छा, यदि तुमने ही सब कुछ रचा तो वेद के शब्द भी तुम्हारे ही होंगे, फिर उसमें अलख निरंजन की बात की ! इसलिए मुझसे छल मत करो और सच-2 कहो ।
शक्ति ने कहा
जब ब्रह्मा यहि विधि हठ ठाना । तब अद्या मन कीन्ह तिवाना ॥ केहि विधि यहि कहूँ समझाई । विधि नहि मानत मोर बड़ाई ॥ जो यहि कहौं निरंजन बाता । कैहि विधि समझे यह विख्याता ॥ प्रथम कह्यो निरंजन राई । मोर दरश काहू नहिं पाई ॥ अबै जो यही अलख लखावो । कौनी विधि ताको दिखलावों ॥ अब विचार पुनि ब्रह्मै समझावा । अलख निरंजन नहिं दरस दिखावा ॥
जब ब्रह्मा ने जिद् की तो शक्ति ने मन में विचार किया कि यह तो मुझे सृष्टा मान ही नहीं रहा है, इसे कैसे समझाऊँ ! यदि इसे निरंजन की बात कहूँ तो यह कैसे समझेगा ! क्योंकि निरंजन ने तो कहा था कि उसे कोई देख नहीं पायेगा, फिर यदि यह कहेगा कि दिखाओ तो कैसे दिखाऊँगी ! यह विचार कर शक्ति ने उससे कहा कि वो किसी को दिखता नहीं है ।
ब्रह्मा ने कहा
ब्रह्मा कहै मोहिं ठौर बतावो । आगा पीछा जनि तुम लावो ॥ मैं ना मानो तम्हरी बाता । ऐसी बात न मोहि सुहाता ॥