अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मा को लेकर आद्य-शक्ति व्याकुल हुई
धर्मदास ने पूछा
कहे धरमनि यह संशय बीती । साहब कहहु ब्रह्मा की रीती ॥ पिता सीस तिन परसन कीन्हा । कि होय निरास पीछे पग दीन्हा ॥
धर्मदास जी ने साहिब से पूछा कि ब्रह्मा के साथ क्या हुआ ! क्या उसने पिता के शीश का स्पर्श किया या फिर निराश होकर लौट गया !
साहिब ने कहा
धर्मदास मुहि अति प्रिय अहहु । कहो सँदेस परखि दूढ़ गहहु ॥ चलत ब्रह्मा तब वार न लावा । पिता दरस कहँ अति मन भावा ॥ तेहि स्थान पहुँचिगै जाई । नहिं तहँ रबि ससि शून्य रहाई ॥ बहु विधि अस्तुत करे बनायी । ज्योति प्रभाव ध्यान तहँ लाई ॥ ऐसे बहु दिन गये बितायी । नहिं पायो ब्रह्मा दर्श पितायी ॥ शून्य ध्यान युग चार गमाना । पिता दरस अजहूँ नहिं पावा ॥
साहिब ने कहा—हे धरमदास ! तुम मुझे बहुत प्रिय हो, अब आगे की बात कहता हूँ, उसे जानो । कहा—ब्रह्मा के दिल में पिता के दर्शन की चाह थी, उसने जाते हुए समय नहीं लगाया । एक स्थान पर पहुँचा तो वहाँ सूर्य, चाँद आदि नहीं थे, शून्य स्थान था । वहाँ ब्रह्मा ध्यान लगाकर बैठ गया और पिता की बहुत भांति से स्तुति करने लगा । ऐसे मैं बहुत समय
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