अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 144 में से
संदर्भ में पढ़ें58
साहिब बन्दगी
जाय देख्यो चतुरमुख कहैं, नाहिं पलक उधारई। कछु क दिन सो रही तहाँवा, बहु रि युक्ति विचारई॥ कौन विधि यह जागिहैं, अब करें कौन उपाय हो। मन गुनन सोचे बहु त विधि, ध्यान जननी लाय हो॥
गायत्री ने जाकर देखा कि ब्रह्मा ध्यान मगन हैं, आँखें बंद किये हुए है, खोलता नहीं है। उसने कुछ दिन तक तो वहीं इंतजार किया, पर जब देखा कि यह जग नहीं रहा है तो विचार किया कि इसे किस तरह जगाऊँ ! यह सोच उसने अद्या का ध्यान किया।
अद्या आयसु पाय, गायत्री तब ध्यान महँ॥ निज कर परसहु, ब्रह्मा तबही जागिहैं॥
अद्या ने कहा कि अपने हाथों से उसके चरण को छुओ, तभी वो जागेगा।
गायत्री पुनि कीन्ही तैसी। माता युक्ति बतायी जैसी॥ गायत्री तब चित्त लगाई। चरण कमल कहँ परसेउ जायी॥
गायत्री ने वैसा ही किया, उसके चरणों को स्पर्श किया।
ब्रह्मा जाग ध्यान मन डोला। व्याकुल भयो बचन तब बोला॥ कवन अहै पापिन अपराधी। कहा छुड़ायहु मोरि समाधी॥ शाप देहुँ तोकहँ मैं जानी। पिता ध्यान मोहि खंड्यो आनी॥
ब्रह्मा ध्यान से जागा और व्याकुल होकर कहा कि मैं पिता के ध्यान में था; ऐसा कौन पापी है, जिसने मेरी समाधि भंग की है, मैं उसे शाप दे दूँगा।
गायत्री ने कहा
कहि गायत्री मोहि न पापा। बूझि लेहु तब देहहु शापा॥ कहँ तोहि सो सांची बाता। तोहि लेन पठयी तुव माता॥ चलहु वैगि जनि लावहु वारे। तुम बिन रचना को बिस्तारे॥