भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साहिब बन्दगी

साखि तो यह देय नाहिं, जननी मोहि लजावई ॥

यहाँ नाहिं पिता पायो, भयो न एको काज हो।

पाप सोचत नहिं बने, अब करौं रति विधि साज हो ॥

कियो भोग रति रंग, विसर्यो सो मन दरश का ॥

दोउ कहैं बढू यो उमंग, छल मति बुद्धि प्रकाश किये ॥

कह ब्रह्मा चल जननी पास। तब गायत्री वचन प्रकाशा ॥

औरौ करौ युक्ति इक ठानी। दूसरी साखि लेहु उत्पानी ॥

ब्रह्मा कहे भली है बाता। करहु सोई जेहि मानै माता ॥

तब गायत्री यतन बिचारा। देह मैल गहि कीन्ह नियारा ॥

कन्या रचि निज अंश मिलावा। नाम सावित्री तासु धरावा ॥

गायत्री तिहि कह समुझावा। कहियो दरस ब्रह्मा पितु पावा ॥

कह सावित्री हम नहिं जानी। झूठी साख दै आपनि हानि ॥

यह सुन दोउ कहैं चिंता व्यापा। यह तो भयो कठिन संतापा ॥

गायत्री बहु विधि समझायी। सावित्री के मन नहिं आयी।

पुनि गायत्री कहा बुझायी। तब सावित्री बचन सुनायी ॥

ब्रह्मा कर मोसों रति साजा। तो मैं झूठ कहों यहि काजा ॥

गायत्री ब्रह्माहिं समुझावा। दै रति या कहूँ काज बनावा ॥

ब्रह्मा रति सावित्रीहिं दीन्हा। पाप मोट आपन शिर लीन्हा ॥

सावित्री कर दूसर नाऊँ। कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥

सावित्री कर दूसर नाऊँ। कहि पुहपावति वचन सुनाऊँ ॥

तीनों मिलि के चलि भे तहाँवा। कन्या आदि कुमारी जहवाँ ॥

सावित्री ने कहा कि उसे पुहुपावती नाम से पुकारा जाए। अब तीनों माता के पास आए।