भारतकोश
अनुरागसागर वाणी

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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अनुरागसागर वाणी

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करते हैं, वेद, पुराण पढ़कर ज्ञान चर्चा करते हैं, राज भोग और स्त्री से प्रसन्न रहते हैं, मन में शंका नहीं आने देते हैं, उत्तम भोजन अच्छा लगता है, उनकी आँखों में तेज होता है, देह में पराक्रम होता है, स्वर्ग तो उनके हाथ ही होता है यानी अपने कर्मों से वे स्वर्ग तो हासिल कर ही लेते हैं।

छूटे नर की देह, जन्म धरे फिर आय के ॥

ताको कहैं संदेश, धर्मदास सुन कान दे ॥

साहिब कहते हैं कि जो मानव शरीर छोड़कर पुनः मानव तन पाता है, अब उसकी पहचान बताता हूँ।

आइ अछत जो नर मर जाई। जन्म धरे मानुस को आई ॥

सूरा होवे नर के माँहीं। भय डर ताके निकट न जाहीं ॥

माया मोह ममता नहिं व्यापे। दुश्मन ताहिं देख डर काँपे ॥

सत्य शब्द प्रतीत कर माने। निंदा रूप न कबहीं जाने ॥

सतगुरु चरण सदा चित राखे। प्रेम प्रीति सो दीनन भाखे ॥

ज्ञान अज्ञान दोइ कहैं बूझे। सत्य नाम परिचय नित सूझे ॥

जो मानुस अस लछन होई। धर्मदास लिख राखो सोई ॥

जो कुछ मानव तन पाने के बाद जल्दी शरीर छोड़ देते हैं, अपनी पूरी आयु से पहले शरीर त्याग देते हैं, वे वीर पुरुष होते हैं, उनके पास भय नाम की कोई वस्तु टिकती भी नहीं, उन्हें माया, मोह, ममता आदि भी नहीं सताती और उनके दुश्मन भी उनसे डरते हैं। वे सत्य शब्दों को प्रेम पूर्वक मान लेते हैं और दूसरों की निंदा नहीं करते। वे गुरु चरणों में चित लगाए रखते हैं, सत्य नाम को पहचान लेते हैं। ऐसे लक्षण जिनमें होते हैं, वे मानुष से मानुष तन में अपनी छूटी हुई आयु पूरी करने आए होते हैं।