अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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साहिब बन्दगी
गंगा जमुना सरसवती जानी । पुष्कर गोदावरी मानी ॥ बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥ सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥ गढ़ गिरनार दत्त को थाना । ताहि घेर हम बैठे निहाना ॥ कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अयोध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बाँध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस लेव मुकताई ॥
निरंजन ने कहा कि बड़े स्थान हैं, जहाँ जीव भ्रमित है। गंगा, यमुना, गोदावरी, मथुरा, बद्रीनाथ, केदार, अयोध्या, पुष्कर आदि जगहों पर बैठ मैंने जीवों को भुलाया हुआ है, फिर किस विधि से तुम उन्हें छुड़ाओगे!
साहिब ने कहा
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ॥ पुरुष नाम को कहुँ समुझाई । जम राजा तब छोड़ पराई ॥ घाट-घाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्द ते होय निबेरा ॥ सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सग हंस घर जाई ॥
साहिब ने कहा—हे निरंजन! मैं परम पुरुष का नाम दूँगा, यम का जोर फिर उनपर नहीं चलेगा, तुम स्थान-2 पर बैठे उन्हें भ्रमित कर रहे हो, मेरे शब्द से वे छूट जायेंगे, शब्द उन्हें अपने साथ अमर लोक ले जायेगा।
निरंजन ने कहा
का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहिं छूटे यम जारा ॥ पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्य को वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ॥