अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंxi रघुनाथजी सोमपुरा का भी आभार मानता हूँ जिन्होंने अपने संग्रह से इसकी एक मातृका उपलब्ध करवाई। इसी प्रकार राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के अधिकारियों के प्रति भी धन्यवाद, जहाँ से इसकी खण्डित मातृका मिली। मनीषी आदरणीय डॉ० महेन्द्र जी भानावत सदैव की तरह मेरे प्रेरक बने रहे, उनके प्रति आभार। इसके प्रकाशन की पहल करने के लिए परिमल पब्लिकेशंस, दिल्ली के संस्थापक संस्कृतविद् श्रीमान् कन्हैयालालजी जोशी का स्मरण करता हूँ, जिन्होंने इसकी पाण्डुलिपि देखकर सन्तोष किया और कहा था कि इसका प्रकाशन निश्चित ही गौरवशाली कार्य होगा। वे गत दिनों नित्यलीलालीन हो गए, उन स्मृतिशेष, यशात्मकाय के प्रति मैं श्रद्धावनत हूँ...। उनके पुत्र चि. श्री परिमल जोशी ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। वे इसका पहला संस्करण बहुत समर्पित भाव से प्रकाशित कर रहे हैं। वे धन्यवादार्ह है। इस ग्रन्थ का पाठ तैयार करने में जिन ग्रन्थों की सामग्री का सहयोग लिया और चित्रादि का उपयोग हुआ, उनके लेखकों, सम्पादकों और प्रकाशकों का आभार। इस ग्रन्थ की जो भी अच्छाइयाँ हैं, वे आनन्द-कन्द-नन्द-नन्दन प्रभुप्रवर श्रीनाथजी की कृपा का प्रसाद है और जो त्रुटियाँ हों, वे मुझ अल्पज्ञ की हैं। मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि विद्वज्जनों के बीच इस ग्रन्थानुवाद को आदर और सम्मान मिलेगा तथा शोधजगत में इसकी विषय-वस्तु पर पुनः वैज्ञानिक शोधानुसन्धान होगा... 40 राजश्री कॉलोनी, विनायकनगर, विदुषां वशंवद उदयपुर (राजस्थान) श्रीकृष्ण 'जुगनू' राधाष्टमी विक्रम संवत् 2067 15 सितम्बर, 2010 ईस्वी