भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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भारतीय कला ग्रन्थ और अपराजितपृच्छा भारतीय कला के मूल ग्रन्थों में अपराजितपृच्छा का अप्रतिम स्थान माना जाता है। नाट्यशास्त्र के लिए जो विश्वकर्मीय शास्त्र द्वितीय अध्याय से लेकर कई स्थलों पर उपस्कारक रहा, उसी प्रकाशमयी परम्परा की कीर्ति-रश्मियाँ अपराजितपृच्छा तक पहुँची जिसके आधार पर मध्यकाल में विश्वकर्मीयशिल्प, ज्ञानप्रकाश दीपार्णव, वृक्षार्णव, वास्तुसार समुच्चय, स्तम्भराज जैसे अनेक शिल्प ग्रन्थों की रचना हुई और सूत्रधार मण्डन, उसके अनुज सूत्रधार नाथा और मण्डन के पुत्र सूत्रधार गोविन्द आदि कृत लगभग दो दर्जन ग्रन्थों की रचनाएँ हुईं। भुवनदेवाचार्य कृत अपराजितपृच्छा केवल ग्रन्थ नहीं है बल्कि हजारों सूत्रधारों, शिल्पकारों के कार्य- सम्पादन का निर्देशक रहा है। इसलिए इसे शिल्पी समुदाय में गुरु-गौरव का स्थान प्राप्त है। विशेषकर, उत्तर और पश्चिमी भारत में इस ग्रन्थ के आधार पर अष्टांग वास्तु रचनाओं का न्यास-विन्यास हुआ है। सूत्रधार समुदाय में इस ग्रन्थ के पूजन- सबद के उच्चारण के बाद अपने कार्य के श्रीगणेश की परम्परा रही है, ऐसा गौरव सम्भवतः अन्य किसी शिल्प-ग्रन्थ को नहीं मिला। ग्रन्थ का स्वरूप विशिष्टताएँ : यह ग्रन्थ केवल वास्तु-स्थापत्य पर आधारित नहीं है बल्कि इसमें कई विषयों का वर्णन है और 12वीं सदी के समय के पश्चिम भारत में प्रचलित विभिन्न सामाजिक परम्पराओं तथा आवश्यकताओं सहित राजाज्ञाओं अथवा शासकोचित संकल्पों का भी सम्यक् विवरण प्रस्तुत करता है। अपराजित के प्रश्न पर विश्वकर्मा ने स्थल-स्थल पर ऐसे निर्देश किए हैं जो तत्कालीन समाज की आवश्यकताओं और अनुकरण योग्य प्रवृत्तियों का द्योतक है। 'शस्यावतार सूत्र' में नित्य सुकाल के ध्येय से जल की बचत के लिए गाँव-गाँव जलाशयों की श्रृंखला खड़ी करने के मूल में रचनाकार समकालीन स्थितियों का सन्दर्भ ही प्रस्तुत करता है। संयोग से यह निर्देश कालजयी हो गया है। इसके पठन-पाठन और निर्देशों को राजा-प्रजा के लिए अनुकरण योग्य बनाने के उद्देश्य की पूर्ति का ग्रन्थकार ने सूत्र-दर-सूत्र ध्यान रखा है। विषय-विवरण के पार्थक्य के परम्परित 'अध्याय' संज्ञा के विपरीत 'सूत्र' नामकरण के मूल में भी यह ध्येय लक्षित है। इसमें सूत्र वह है जो श्लोक रूपेण मुक्ताओं को पिरोये हुए है और वह सूत्र अपने-आप में गुर (टिप्स, नियम) का स्वरूप लिए हुए है। चरक ने सूत्र को गम्भीरता के साथ किसी वेद की शाखा, विद्या, ज्ञान, शास्त्र, लक्षण और तन्त्र के पर्याय और समानार्थी के रूप में स्वीकृत