भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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किया है : तत्रायुर्वेदः शाखा विद्या सूत्रं ज्ञानं शास्त्रं लक्षणं तन्त्रमित्यनर्थान्तरम् ॥ (चरक. सूत्रस्थान 30, 31) इस प्रकार इसके अर्थ-गाम्भीर्य को लक्षित किया जा सकता है। इस ग्रन्थ में भारत में प्राचीन काल से ही चली आ रही वैज्ञानिक कलाओं का सम्यक् विवेचन मिलता है, चूँकि विश्वकर्मा ही इन कारू व चारू कलाओं के प्रवर्त्तक माने जाते हैं, अतः वे ही इसमें प्रवक्ता के स्वरूप में हैं। ग्रन्थ पूरी तरह उद्देश्यमूलक है और ग्रन्थकार ने इसकी संकल्पना के मूल में कलाओं के संरक्षण सहित उनके सम्पादन का विचार अपने सम्मुख रखा है। यह ग्रन्थ शास्त्रों का शास्त्र है, समकालीन समाज में जो कुछ कौतुक था अथवा जिन बातों को लेकर जन-मन में कुतूहल था, वह सब इस ग्रन्थ का प्रतिपाद्य है। यह कारू-कर्मनों का ही मैन्युअल नहीं है, बल्कि पुराविदों के लिए पौराणिक प्रसंगों की पूर्ति का प्रकाशपुंज है; दैवज्ञों के लिए साक्षात् ज्योतिर्ज्ञान है; सूत्रधारों के लिए स्थापत्य-शास्त्र है, मूर्तिकारों के लिए प्रतिमाशास्त्र, चित्रकारों के लिए चित्रकर्मशास्त्र है; तन्त्रज्ञों के लिए तन्त्रागम हैं; पटवों-आभूषणकर्मियों के लिए प्रसाधनीय आभरण-निर्देशिका, गजपालकों और अश्वपालकों के लिए पशुपालन है; सिकलीगरों-शस्त्रकारों के लिए आयुध-ज्ञानावली और गायकों-वादकों, नट-शैलूषों के लिए गान्धर्व-ज्ञानकोश है— जो जिस ज्ञानानुशासन का पण्डित है, यह उसके पूर्णतः पठन-पाठन योग्य प्रमाण-पुस्तक है, क्योंकि सब कोई विश्वकर्मा की सन्तान है और इससे उनके गुण-कौशल में अभिवृद्धि होती है, यह उनके लिए गुणमञ्जरी है। विषय-वस्तु के आधार पर इस ग्रन्थ में लोक-मान्यताओं सहित कई शास्त्रों का स्वरूप दिखाई देता है और उसे निम्न शीर्षकों में विभाजित किया जा सकता है—

  1. पुरागमशास्त्र : ग्रन्थरम्भ में गन्धमादन पर्वत के वर्णन से लेकर अट्ठासी तपस्वियों की तपश्चर्या, विश्वकर्मा के दिव्याश्रम और उनके स्वरूप का वर्णन और सूत्रधारों के लिए ज्ञातव्य विषयों का विवरण देते हुए ग्रन्थकार ब्रह्माण्डोत्पत्ति से अपने विषयों का चयन और उनका सम्यक् परिपाक करता हुआ बढ़ता है। इस क्रम में पातालों, द्वीपों, समुद्रों, पर्वतों, ऊर्ध्वाध लोकों का वर्णन एकदम पौराणिक शैली में करता है। इसमें प्रकृति, गुण, विप्रादि वर्णों, उनके गोत्रों, संसारावतरण और लोकों सहित जम्बूद्वीप, नव-वर्षों में निवास करने वाली प्रजा का वर्णन ज्ञेय है। इसके अन्तर्गत गन्धर्वादि संस्थान, संसारभूत ग्रामोत्पत्ति, गर्भ विकास, पञ्चतत्त्व, पञ्चगुण, गर्भविज्ञान, अठारह गुण-दोष, शिव-शक्ति ब्रह्मज्ञान और गीता के