भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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58 अपराजितपृच्छा कर्मज्ञानोद्भवो नाम त्रयोदशं सूत्रम् ॥ 13 ॥ अपराजित उवाच - केवलं कुलजं ज्ञानं शास्त्रजं क्षेत्रजं तथा । चतुर्मार्गबहिस्थं च कथय परमेश्वर ॥ 1 ॥ कष्टं साध्यं विना कष्टैरभ्यासं किल शाश्वतम् । कथयस्व प्रसादेन ज्ञानाभ्यासस्तु वै यथा ॥ 2 ॥ अपराजित बोले - केवलज्ञान, कुल से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र से प्राप्त होने वाला ज्ञान और क्षेत्रीय परम्परानुसार होने वाले ज्ञान के अतिरिक्त जो बाहरी ज्ञान शेष है, उसे भी हे परमेश्वर ! कहिए। यह सब ज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास चाहे कष्ट साध्य हो अथवा बिना कष्ट साध्य, सारा शाश्वत ज्ञान आप कृपाकर जैसा भी हो, कहिए। विश्वकर्मोवाच - अग्निः काष्ठे तिले तैलं क्षीरमध्ये यथा घृतम्। गुरुवत् कर्मयोगेन अभ्यासो ज्ञानदेहजः ॥ 3 ॥ यथा चात्यूर्ध्वसंस्थोऽपि दृश्यते जलचन्द्रमाः । तथा सर्वत्रसंस्थोऽपि ह्यात्माल्पैरवे दृश्यते ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा बोले - हे वत्स ! जिस प्रकार अग्नि काष्ठ में, तेल तिल में और घी दूध में अदृश्य रूप में स्थित है, परन्तु अभ्यास से ये सब ही प्राप्त किए जाते हैं, उसी तरह ज्ञान भी देह में अदृश्य रूप में उपस्थित है जिसे गुरु के समान कर्मयोग के अभ्यास द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। जिस प्रकार अत्यन्त ऊँचे होने पर भी चन्द्रमा को हम जल में आसानी से निकट देख सकते हैं, उसी प्रकार सभी में सर्वत्र स्थित आत्मा को भी अपनी आत्मा द्वारा अल्प प्रयास मात्र से देखा जा सकता है। अदृष्टरूपे दृष्टव्यं हस्तौ चापि तथा श्रुतिः । अव्यक्ते व्यक्तरूपं च व्यक्ताव्यक्तस्य सम्भवः ॥ 5 ॥ क्षरं चैव परित्यज्य ध्यायेदात्मानमक्षरम्। त्रिपदं( थं ) स्यात्परं स्थानं परं ब्रह्मा तदुच्यते ॥ 6 ॥ जिस प्रकार हाथ से स्पर्श करके या या कान से सुनकर भी अदृष्ट वस्तु का ज्ञान दृष्ट रूप की तरह हो जाता है, उसी प्रकार अव्यक्त को भी व्यक्त रूप में और मिश्र रूप में व्यक्ताव्यक्त भाव को भी देखा जाना सम्भव है। व्यक्ति को चाहिए कि