अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-१२ ७१ प्रकार से या बहुत प्रकार से वैसे ही देखता है जैसे एक चन्द्रमा जल ही लहरों पर अनेक रूपों में दिखाई देता है, फिर भी वह वास्तव में एक ही है। इसी जल- चन्द्रवत न्यायानुसार आत्मा ही आत्म चैतन्य को अपनी आत्मा में ही स्वयं सृजन करती है और अपनी स्वयं की की गई नानात्व की कृतियों को वही आत्मा स्वयं उन्हें प्रलीयते अर्थात् मिटा देती है।¹ ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥ 19 ॥² आकाश की ओर मूलवाले और नीचे की ओर शाखा वाले जिस संसार-रूप अश्वत्थ वृक्ष को अव्यय अर्थात् कभी व्यय नहीं होने वाला— ऐसा कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं (अर्थात् विविध छन्दों के सृष्टि के रूप ऐसे ही असंख्य हैं जैसे किसी पीपल के असंख्य पर्ण हों), उस संसार-वृक्ष को जो तत्त्व से जानता है, वह सम्पूर्ण वेदों को जानने वाला है। एकस्तम्भे नवद्वारे त्रिशूले पञ्चदेवताः। क्षितिप्राकारसन्नद्धेऽनुपरिचारनायकाः ॥ 20 ॥ यह जीवात्मा एक स्तम्भ पर टिका हुआ है, वह स्तम्भी ऐसा है कि जिसमें नौ द्वार हैं, तीन शूल हैं, पाँच देवता हैं और उसके भूमि पर परकोटे पर सन्नद्ध पहरेदार चार नायक सैन्य है।³ इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गर्भविज्ञानोद्भवाधिकारो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ 12 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गर्भविज्ञान उद्भव अधिकार नामक बारहवां सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 12 ॥
- श्रीमद्भगवद्गीतायां— क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा। भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥ (13,
- श्रीमद्भगवद्गीतायां (15, 1) तथा च कठोपनिषदे — ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः। तदेवं शुक्लं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते॥ तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन। एतद्वैतत्॥ (2, 3, 1)
- एक स्तम्भ अर्थात् यह शरीर। नवद्वार अर्थात् इस देह के नौ द्वार— दो आँखें, दो कान, दो नासिका, एक मुंह, एक उपस्थ और एक गुह्य। तीन शूल अर्थात् सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण। पाँच देवता अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश। चार सेनानायक अर्थात् धीरोदात्त, धीरप्रशान्त, धीरललित, धीरोद्धत (अग्निपुराण, काव्यशास्त्रीय भाग) या अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट अथवा चार अन्तःकरण— मन, बुद्धि, चित्त व अहङ्कार।