भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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56 अपराजितपृच्छा ज्ञानं गुरुमुखोद्भूतं संसृतेः पाशच्छेदनम्। ये भजन्ति गुरुं भक्त्या सूर्य तमिहरं यथा ॥ 12 ॥ लभन्ते ते ततो ज्ञानं धर्मे तीर्थे महात्मनि। अर्थदानप्रभावेण ज्ञास्यन्ति तपसां क्रमम् ॥ 13 ॥ ज्ञाने मोक्षं तपो राज्यं दाने भोग्यं महोत्कटम्। एवं तु जायते मुक्तिर्यो जानाति स पण्डितः ॥ 14 ॥ गुरुमुख से उद्भूत ज्ञान संसार रूपी भवसागर के पाशों को काटने वाला है और जो लोग भक्तिपूर्वक गुरु की पूजा और आज्ञा में रहते हैं, उनका अज्ञानान्धकार उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य का प्रकाश अन्धकार को समास कर देता है। ऐसे भक्त लोग इस ज्ञान को धर्मस्थानों में तथा तीर्थस्थानों में महात्मा स्वरूप गुरुओं से प्राप्त करते रहते हैं और अपने अर्थ के दान-पुण्य के प्रभाव से वे तपस्या के क्रम को जान लेते हैं। वे यह सम्यक् प्रकार से जान जाते हैं कि ज्ञान का फल मोक्ष है, तप का फल राजपद पाना है, दान का फल महान भोगों को भोगना है। इसी तरह से मुक्ति होती है। यह जानने वाला ही सही तौर पर पण्डित कहा जाता है। यः करोति स कर्त्ता च भूतात्मा कथ्यते बुधैः। जीवसञ्ज्ञो ह्यन्तरात्मा सहजः सर्वदेहिनाम् ॥ 15 ॥ येन वेदयते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु। न भूत भूतसम्पर्कों महाक्षेत्रज्ञ एव सः ॥ 16 ॥ जो करता है, वही कर्ता है जिसे विद्वान लोग 'भूतात्मा' कहते हैं और सभी देहियों की सहज अन्तरात्मा को 'जीव' संज्ञा से कहा जाता है और जिससे जन्म लेने के उपरान्त के सभी सुख-दुःख जाने जाते हैं, उसे ही 'महाक्षेत्रज्ञ' कहा गया है¹, उसे कोई भूत-प्राणी या भूत सम्पर्क-प्राणी का स्पर्श नहीं होता। वह तो केवल साक्षी और दृष्टा मात्र है। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्। इदं शरीरं ज्ञानेन क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥ 17 ॥ आत्मैव चात्मचैतन्यमात्मना सृजति स्वयं। आत्मना कृतं नानात्वमात्मन्येव प्रलीयते ॥ 18 ॥ वह ज्ञानी अपने सात्विक ज्ञान से इस शरीर को 'क्षेत्र' समझता है। उसे एक

  1. श्रीमद्भगवद्गीतायां - इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ (13, 1)