अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र- १२ 55 अपनी आँखों के स्नेह-पाश से कामीजन मोह रूपी अज्ञान में पड़कर ऐसे कर्म कर बैठते हैं जिनसे वे इस संसार रूपी गर्त में वैसे ही गिरते हैं, जैसे कोई पतङ्गा दीप की बाती को जलते हुए देखकर स्नेह और मोहवश जलते हुए दीप की लौ में हठात् गिरकर अपने पङ्ख जला बैठता है और मृत्यु को प्राप्त करता है। इसके विपरीत जो लोग अपने को वेद की दृष्टि के अनुसार चलकर ज्ञान की दृष्टि से देखते हैं, वे लोग परमपद को प्राप्त करते हैं और पुनर्भव में नहीं पड़ते अर्थात् पुनर्जन्म नहीं लेते, उनकी सीधे ही मुक्ति हो जाती है। उद्यमैः साहसैर्धैर्यैर्गुरुभक्तिपरायणाः । धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तिहेतुर्मनीषया ॥ 7 ॥ नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥ 8 ॥ अतः मनीषियों, ज्ञानियों, समझदारों को चाहिए कि वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पदार्थ चतुष्टय की प्राप्ति के लिए उद्यमपूर्वक, धैर्य और साहस के साथ गुरु-भक्ति परायण होकर सदाचरण युक्त जीवन व्यतीत करें। क्योंकि, अरबों-खरबों कल्पों में भोगे गए कर्मों का फल कभी भी क्षीण नहीं हो सकता और शुभ या अशुभ कर्म जो भी किए जा चुके हों, उनका शुभ या अशुभ फल भी अवश्य भोगना पड़ता है। कृतयुगानुरूपेणज्ञानमाह — कृतत्रेताद्वापरे च चतुर्थे वा कलौ युगे । ज्ञानं धर्मो गुरुर्देवो युगानुरूपभावना ॥ 9 ॥ कृते तु सहजं ज्ञानं त्रेताया कुलजं तथा । द्वापरे शास्त्रजं ज्ञानं क्षेत्रजं तु कलौ युगे ॥ 10 ॥ सहजं कुलजं चैव शास्त्रजं क्षेत्रजं तथा । एवं चतुर्विधं ज्ञानं युगरूपानुमोदितम् ॥ 11 ॥ (1.) कृतयुग, (2.) त्रेतायुग, (3.) द्वापरयुग और (4.) कलियुग में (1.) ज्ञान, (2.) धर्म, (3.) गुरु और (4.) देवता के प्रति अपने-अपने युग के अनुरूप ही लोगों की भावना होती है। इस नियमानुसार सत्युग में अपने सहज ज्ञान से; त्रेतायुग में अपने कुल की परम्परा के ज्ञान से; द्वापर में शास्त्रों के अनुसार प्रचलित ज्ञान से और कलियुग में अपने क्षेत्र के आसपास के रीति-रिवाजों के ज्ञान प्रवृत्त होते हैं। इस प्रकार सहज, कुलज, शास्त्रज और क्षेत्रज—इन चार विधियों का ज्ञान इन युगों के अनुरूप अनुमोदित किया गया है।