भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 535 में से

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54 अपराजितपृच्छा पृथक् प्रत्येक के पुनः पाँच गुण होते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योपराजितपृच्छायां पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयाधिकारो नामैकादशं सूत्रम् ॥ 11 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पञ्चतत्त्व पञ्चगुण निर्णय अधिकार नामक ग्यारहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 11 ॥ गर्भविज्ञानोद्भवो नाम द्वादशं सूत्रम् ॥ 12 ॥ अपराजित उवाच — पञ्चविंशगुणैर्युक्ताः पञ्चतत्त्वसमन्विताः । वर्तन्ते संसृतौ ये तु तेषां मोक्षः कथञ्चन ॥ 1 ॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राप्तिरेषां कथं भवेत् । किं तेषां च फलं लोके संसारसारसागरे ॥ 2 ॥ अपराजित बोले — पच्चीस गुणों से युक्त इन पञ्चतत्त्वों से समन्वित होकर जो प्राणी इस संसार में आते हैं, उनका मोक्ष, उद्धार कैसे होता है ? कहें। इनको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष— इन पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति किस प्रकार होती है और उनको इस संसार रूपी भवसागर में आने का इस लोक में क्या फल मिलता है ? विश्वकर्मोवाच — उत्पन्ना गर्भसम्भूतेर्निःसृता योनिसङ्कटात् । अचैतन्या अस्मराश्च उद्भूता बधिरान्धकाः ॥ 3 ॥ तत्रैवं ते प्रवर्तन्ते संसारजालमोहिताः । कामात्मानः प्रपीड्यन्ते तृष्णाक्रान्तास्तथैव च ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा बोले— गर्भवास मे आकर योनि सङ्कट से निकलने वाले प्राणी यदि अचेतन अवस्था में जन्मते हैं तो या तो बहरे हो जाते हैं या अन्धे होते हैं। इसी तरह से वे संसार जाल से मोहित होकर तृष्णाओं से घिरे हुए तरह-तरह की कामनाओं से पीड़ा पाते हुए प्रवृत्त होते हैं। चक्षुर्भिः स्नेहपाशैश्च मोहं कुर्वन्ति कामिनः । पुनः पतन्ति संसारे पतङ्गा दीपवर्त्तिषु ॥ 5 ॥ आत्मानं वेदचक्षुर्भिः पश्यन्ति ज्ञानदृष्टयः । ते नराः परमं यान्ति न पतन्ति पुनर्भवे ॥ 6 ॥

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