भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-११ 53 इत्यमनन्तरमहाभूतादिकमाह— अथ चैवं प्रवक्ष्यामि महाभूतविनिर्णयम्। पञ्चात्मकः परो भावो ह्यपरं पञ्चभूतकम् ॥ 14 ॥ अब मैं महाभूतादिकों के विषय में कहता हूँ। इन पञ्चभूतों का परोभाव पञ्चात्मक होता है, जो निम्नानुसार होगा— त्वचामांसास्थिनखरा रोमाण्याद्या पञ्चकम्। क्षितेरेतान् गुणान् पञ्च वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ 15 ॥ देह में (1.) त्वचा, (2.) मांस, (3.) अस्थि, (4.) नख और (5.) रोम— ये पाँचों पृथ्वी के गुण होते हैं, ऐसा ब्रह्मवादियों का कहना है। लाला मूत्रं तथा शुक्रं मज्जा रक्तं च पञ्चमम्। इमान्यपांव्यञ्जकानि वदन्ति ज्ञानिनः सदा ॥ 16 ॥ इसी प्रकार (1.) लार, (2.) मूत्र, (3.) शुक्र, (4.) मज्जा और (5.) रक्त— ये पाँचों गुण जल से बनते हैं, ज्ञानियों का सदा से ही ऐसा कहना है। क्षुधा तृषा तथा निद्रा चालस्यं कान्तिरेव च। तेजस्तु समुत्पन्ना वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ 17 ॥ इसके अतिरिक्त (1.) क्षुधा, (2.) तृष्णा, (3.) निद्रा, (4.) आलस्य और (5.) कान्ति— देह में इन पाँचों गुणों को तेजोत्पन्न जानना चाहिए, ऐसा ब्रह्मवादियों का कहना है। धावनं प्लवनं चैव सङ्कोचनप्रसारणे। निरोधः पञ्चमश्चैव वायोरेतन्तु पञ्चकम् ॥ 18 ॥ वायु से उत्पन्न होने वाले गुण हैं— (1.) धावन या दौड़ना, (2.) प्लवन या बहना, (3.) सङ्कोचन या सिकुड़ना, (4.) प्रसारण या फैलना और (5.) निरोध। रागद्वेषौ भयं मोहः प्रसादश्चैव पञ्चमः। एते पञ्च गुणाः प्रोक्ता आकाशस्य व्यवस्थिताः ॥ 19 ॥ इसी प्रकार (1.) राग, (2.) द्वेष, (3.) भय, (4.) मोह और (5.) प्रसाद या प्रसन्नता— ये पाँचों गुण आकाश की व्यवस्था में कहे गए हैं। पञ्चतत्त्वैः समुत्पन्ना गुणानां पञ्चविंशतिः₂₅ । पृथक् पृथक् च प्रत्येकं पञ्च पञ्चकसम्भवः ॥ 20 ॥ इस प्रकार इन पञ्चतत्त्वों से पच्चीस गुण उत्पन्न होते हैं। इन सबके पृथक्-