भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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52 अपराजितपृच्छा रन्ध्र-छिद्र तथा सातवें माह में उसके गुसाङ्ग और अण्डकोश बनते हैं। इस प्रकार बढ़ते-बढ़ते वह कलल आठवें मास तक सभी अङ्गों की सम्पूर्ति से युक्त हो जाता है और नवें मास में पहुँचने पर वह गर्भस्थ प्राणी स्वयं अपने आपको स्मरण करने लगता है।¹ मातरं पितरं भ्रातॄन् पुत्रपौत्रादिकं तथा। ज्ञानतोऽथ प्रार्थयते धर्मं च देवतादिकम्॥ 10 ॥ येनाहं न पतेयं वै संसारयोनिसङ्कटे। अहं तं च करिष्यामि निःसृतो गर्भवासतः ॥ 11 ॥ इस प्रकार स्मरण करता हुआ वह अपने पूर्व के माता-पिता, भाई-बन्धु, पुत्र- पौत्रादिकों को याद करता हुआ अपने धर्म और देवताओं की प्रार्थना करता है कि जिससे मैं संसार में इस योनि सङ्कट गर्भवास में पुनः नहीं पहूँ, वही मैं करूँगा, यदि मैं गर्भवास से बाहर आ जाऊँ। विकासो जायते तस्य गर्भवासं ततस्त्यजेत्। योनेर्यो निस्सरेत्तिर्यक् मृत्युस्तस्य भवेद् ध्रुवम्॥ 12 ॥ बधिरो वा भवेदन्धो जायते मूर्च्छनादिकम्। एवं विनिःस्रतो जन्तुः संसारे मुह्यते क्षणात्॥ 13 ॥ इस प्रकार पूर्ण विकास हो जाने पर वह गर्भवास को तत्काल त्याग देता है। इस अवस्था में यदि वह गर्भस्थ शिशु योनि से बाहर निकलते समय तिर्यक् अर्थात् आड़ा पड़ जाए तो उसकी निश्चित ही मृत्यु हो जाती है, यह ध्रुव सत्य है। यदि योनि से बाहर आते समय वह मूर्च्छित अवस्था में होता है तो बहरा अथवा अन्धा हो जाता है परन्तु इस प्रकार स्वस्थ जन्म लेने वाला जन्तु जीव संसार को तत्क्षण मोहित कर लेता है और सबको प्रसन्न कर देता है।

  1. वराहमिहिर का मत है कि गर्भाधान के पहले मास से लेकर सातवें मास तक क्रमशः शुक्र, मङ्गल, गुरु, सूर्य, चन्द्र, शनि और बुध मासाधिपति होते हैं। इनके प्रभाव से पहले मास में गर्भ का रूप कलल अर्थात् शुक्र-शोणित मिश्रित झिल्ली का आकार, द्वितीय में पिण्डाकार (घन) तीसरे में अवयव, चतुर्थ में अस्थिवाला, पाँचवें में त्वचा, छठे में रोम और सातवें में स्मृतियुक्त होता है। इसके बाद, आठवें से दसवें मास तक क्रमशः लग्नेश, चन्द्र और सूर्य मासाधिपति होते हैं। उनके प्रभाव से आठवें मास में असन (मातृभुक्त-अन्नभोजन), नवें मास में उद्वेग और दसवें मास में प्रसव होता है- कललघनावयवास्थित्वग्रोमस्मृति समुद्भवः क्रमशः। मासेषु शुक्रकुजजीवसूर्यचन्द्रार्कि सौम्यानाम्॥ अशनोद्वेगप्रसवाः परतो लग्नेशचन्द्रसूर्याणाम्। कलुषैः पीडा पतनं निपीडितैर्निर्मलैः पुष्टिः ॥ (लघु जातकम् 5, 6-7)