भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-११ 51 सका जिससे शिव-शक्ति परात्पर, सबसे महान माने जाते हैं। यह सब काम के संयोग से शिव-शक्ति का ही प्रभाव है जिससे स्वयं ब्रह्मा के हृदय में इसी तरह का नाद और बिन्दू का समुद्भव हुआ। एकीभूतं यदा काले त्वन्तकाले प्ररोहति। सङ्क्रमच्छुक्ररक्तं तु ब्रह्मविष्णुशिवात्मजम् ॥ ४ ॥ इस तरह जब जिस काल में यह नाद और बिन्दू एकीभूत हुआ या मिला और अन्त में जब वह एकीभूत स्वरूप शुक्र व रक्त के संक्रमण से मिलने से प्ररोहण करने लगा, बढ़ने लगा तो वह ब्रह्मा, विष्णु और शिव का ही आत्मज-सन्तान है, ऐसा समझना चाहिए। पिण्डनिर्माणचरणमाह — कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रैश्च बुद्बुदम्। शोणितं दशरात्रैश्च मांसहीनं चतुर्दशैः ॥ ५ ॥ घनं मांसं विंशतिभिर्गर्भस्थं वर्द्धते क्रमात्। एकमासे च सम्पूर्णे पञ्चतत्त्वानि धारयेत् ॥ ६ ॥ यह शुक्र-रक्त का एकीभूत रूप जब बढ़ता है तो एक रात्रि में उसका रूप कलल कहा जाता है और वही जब पाँच रात्रि का हो जाता है तब बुद्बुद कहा जाता है। दस रात्रि का हो जाने पर उसे ही शोणित कहते हैं और चौदह दिन का हो जाने पर उस मांसहीन कहते है। इस प्रकार वह बढ़ते-बढ़ते बीस दिन में घन मांसपिण्ड रूप बनकर गर्भस्थ होकर क्रमपूर्वक बढ़ता जाता है और पूरा एक मास का हो जाने पर पञ्चतत्त्वों को धारण कर लेता है। मासद्वये च सम्पूर्णे मांसपिण्डः प्रजायते। मज्जास्थिनी त्रिभिर्मासैः केशाङ्गुल्यश्चतुर्थके ॥ ७ ॥ कर्णजिह्वानासिकाश्च रन्ध्रं मासे तु पञ्चमे। कण्ठरन्ध्रोदरे षष्ठे गुह्यं चाण्डं च सप्तमे ॥ ८ ॥ सर्वाङ्गसन्धिसम्पूर्तिरष्टमासैः प्रजायते। मासे च नवमे प्राप्ते गर्भस्थः स्मरति स्वयम् ॥ ९ ॥ यही जब दो मास का हो जाता है तो मांसपिण्ड बन जाता है। उसमें तीन मास में मज्जा, अस्थि आदि बनती है और चौथे मास में उसके केश और अङ्गुलियाँ भी बनने लगती है। इस तरह बढ़ते-बढ़ते पाँचवें मास में उसके कान, जिह्वा, नासिका आदि के रन्ध्र बनते हैं। छठे मास तक बढ़ने पर तो इसमें कण्ठ के और उदर के