भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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50 अपराजितपृच्छा की योनियाँ हैं जिनसे यह संसार की सृष्टि सम्भव हुई है।¹ कामक्रोधलोभमोहभयादि पञ्चकोद्भवः। एवमादि गुणोपेताः पञ्चकामेन्द्रियाणि च॥ 28 ॥ अब पञ्च कामेन्द्रियों से उनके गुणों से उत्पन्न होने वाले (1.) काम, (2.) क्रोध, (3.) लोभ, (4.) मोह और (5.) भय को समझें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयाधिकारो नाम दशमं सूत्रम् ॥ 10 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में संसार भूतग्राम उत्पत्ति पञ्चतत्त्व निर्णय अधिकार नामक दसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 10 ॥ पञ्चतत्त्वपञ्चगुणनिर्णयो नामैकादशं सूत्रम् ॥ 11 ॥ अपराजित उवाच - कथं भवश्च जीवानां स्नेहः स्त्रीणां नृणां कथम्। स्नेहात्त्वां परिपृच्छामि ह्लादयन्तं निजात्मजम् ॥ 1 ॥ अपराजित बोले - इस भव-संसार में जीवों में स्नेह किस प्रकार बनता है और यहाँ के स्त्री-पुरुषों में भी लगाव किस प्रकार बनता है, यह सब मैं आपसे स्नेह होने के कारण बड़ी नम्रतापूर्वक पूछता हूँ, अतः इसका उद्बोधन करके आप अपने आत्मज मुझ अपराजित को आह्लाद-प्रसन्नता प्रदान करें। विश्वकर्मोवाच - शिवशक्तिस्नेहात्मकः कामश्च हृदयात्मजः। ततः सम्युक्तयोगश्च शिवशक्ती परात्परे ॥ 2 ॥ इति कामस्य संयोगाच्छिवशक्तिप्रभावतः। स्वयं ब्रह्मरुतेनैव नादबिन्दुसमुद्भवः ॥ 3 ॥ विश्वकर्मा बोले - शिव तथा शक्ति² के हृदय से उत्पन्न होने वाले काम से ही शिव-शक्ति में स्नेहात्मक भाव की उत्पत्ति हुई तथा इससे ही यह संयुक्तयोग बन

  1. तथा च भागवतीगीतायां - अण्डजाः स्वेदजाश्चैवोद्भिजाश्चैव जरायुजा। अण्डजाः पक्षिसर्पाद्याः स्वेदजा मशकादयः॥ वृक्षगुल्मप्रभृतयश्चोद्भिजा हि विचेतनाः। जरायुजा महाराज मानुषाः पशवस्तथा॥ शुक्रशोणितसम्भूतो देहो ज्ञेयो जरायुजः। (महाभागवत अपरनाम देवीपुराण 17, 6-8)
  2. अन्यच्च - शक्तिद्वयं हि मायया विक्षेपावृत्तिरूपकम्। विक्षेपशक्तिर्लिङ्गादिब्रह्माण्डन्तं जगत्सृजेत्॥ अतर्हद्दृश्ययोर्भेदं बहिञ्च ब्रह्मसर्गयोः। आवृणोत्यपरा शक्तिः सा संसारस्य कारणम्॥ (वेदान्तसारटीका)