अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-१० 49 ब्रह्मबिन्दुसमायोगं शिवशक्तिः परात्परम्। संयुक्तयोग एवं यो योगयुक्तः स उच्यते॥ २२॥ योग युक्तियों के प्रयास से बनने वाले संयोगों, कामों में तथा योग युक्ति रहित (?) कामों में बनने वाले अयोगकारी काम आदि सब शिव-शक्ति के सम्मिलित प्रयास से होने वाले सफल काम की तरह एवं ब्रह्मा, विष्णु की सम्मिलित शक्ति अपने आप होने वाले काम की तरह संयोग ही है। ब्रह्म और नादबिन्दु के समायोग से जो परात्पर सर्वोच्च शिवशक्ति प्रकट होती है, उसे ही संयुक्तयोग तथा योगयुक्त-ऐसा कहा जाता है। रक्तः पीतः श्वेतकृष्णौ श्यामो नीलस्तथा हरित्। सप्तधास्तु इमे प्रोक्ताः सप्तस्थानादिकोद्भवाः॥ २३॥ सात स्थानों से उत्पन्न होने वाले (1.) रक्त-लाल, (2.) पीत-पीला, (3.) श्वेत-सफेद, (4.) कृष्ण, (5.) श्याम-सांवला (6.) नील-आसमानी, (7.) हरित्- हरा- ये सप्तधातु कहलाते हैं। श्वेताः श्वेतसमुद्भूता रक्ता रक्तसमुद्भवाः। पीताः पीतसमुत्पन्नाः कृष्णाश्च मेचकोद्भवाः॥ २४॥ श्यामाः श्यामसमुद्भूता नीलाश्च ज्योतिर्मण्डले। निशा भासाद्भवोत्पन्नाः सङ्ख्याः सप्त प्रकीर्तिताः॥ २५॥ श्वेत सभी श्वेत वस्तुओं से बनते हैं, रक्त सभी लाल वस्तुओं से, पीत सभी पीली वस्तुओं से, कृष्ण काली वस्तुओं से बनते हैं। श्यामा-सांवले रङ्गों की वस्तुओं से तथा नीले नील की वस्तुओं से इस ज्योतिर्मण्डल में बनते हैं। इसी प्रकार (हरित) हल्दी जैसी वस्तुओं से होते हैं, इन सबकी संख्या सात कही गई है। रागद्वेषालसाश्चैव विमला मतसम्भवाः। चतुर्विधा भूतग्राम मेतसांनि चतुर्विधा ?॥ २६॥ अण्डजा उद्भिजाश्चैव जरायुजाश्च स्वदेजाः। चतुर्विधा योनिजाश्च संसारे सृष्टिसम्भवाः॥ २७॥ (1.) राग, (2.) द्वेष, (3.) आलस्य, (4.) विमल-निर्मलता और (5.) मल- मैल से उत्पन्न होने वाले चार तरह के प्राणी समूह होते हैं जो भी सब चार प्रकार के होते हैं। ये चारों (1.) अण्डज- अण्डों से उत्पन्न होने वाले, (2.) उद्भिज- पृथ्वी पर उगने वाले पेड़-पौधे, (3.) जरायुज- गर्भ में उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि और (4.) स्वेदज- पसीने से उत्पन्न होने वाले जूँ, खटमल आदि जीव। ये चार प्रकार