भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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48 अपराजितपृच्छा गतिर्ग्राहः श्रुतिर्व्याप्तिर्विसर्गो दशपञ्चकम्₁₅ । ( 1 . ) पृथ्वी, ( 2 . ) जल, ( 3 . ) तेज ( 4 . ) वायु और ( 5 . ) आकाश— ये पाँच, ( 1 . ) शब्द, ( 2 . ) स्पर्श, ( 3 . ) रस, ( 4 . ) रूप ( 5 . ) गन्ध— ये पाँच और ( 1 . ) गति, ( 2 . ) ग्राह्यता, ( 3 . ) श्रुति, ( 4 . ) व्याप्ति, ( 5 . ) विसर्ग— ये पाँच मिलकर कुल पन्द्रह होते हैं। अहङ्कारो रागद्वेषौ क्रोधोऽस्मिता प्रकृतयः ॥ 16 ॥ मनः प्रज्ञा बुद्धिचित्तभावाश्च पञ्चविंशतिः₂₅ । कामो मदो लोभमोहौ भयं तत्त्वानि त्रिंशतिः₃₀ ॥ 17 ॥ इनमें ( 1 . ) अहङ्कार, ( 2 . ) राग, ( 3 . ) द्वेष, ( 4 . ) अस्मिता, ( 5 . ) क्रोध, ( 6 . ) प्रकृतियाँ,