भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र- १० 47 शब्दो ब्रह्मादि ? सम्भूतः पञ्चतत्त्वानि वै विदुः । गतिर्ग्राहस्तुतिर्व्याप्तिर्विसर्गश्चैव पञ्चकम् ॥ ९ ॥ पृथ्वी से ( 1.) स्पर्श, जल से ( 2.) रस, तेज से ( 3.) रूप, वायु से ( 4.) गन्ध और आकाश से ( 5.) शब्द गुण उत्पन्न जानना चाहिए। जिह्वा से जो रस आता है, उसका कारण स्वाद है। आँखों से रूप का और नासिका से गन्ध का भान होता है, ऐसा माना जाता है। जिसे शब्द कहा है, वह ब्रह्म के आदि में आकाश से सम्भूत हुआ, इन्हीं को विद्वानों से पञ्चतत्त्व कहा है। ( 1.) गति, ( 2.) ग्रहण करना, ( 3.) स्तुति, ( 4.) व्याप्ति और ( 5.) विसर्ग— ये पाँच शारीरिक क्रियाएँ हैं। पादैः स्याद् गतिसंयोगः हस्तैस्तु ग्रहणं भवेत्। उपस्थानैर्व्यापयन्ति विसर्जन्ति गुदेन च ॥ 10 ॥ श्रुतिः श्रोत्रेन्द्रियेणैव जिह्वया च तथा रसः । एवं तत्त्वोद्भवा सृष्टिस्तन्मात्रादिकमुच्यते ॥ 11 ॥ पाँव से गति का संयोग होता है और हाथों से ग्रहण करने का कार्य होता है। उपस्थान से व्याप्ति का कार्य एवं गुदा से विसर्जन का कार्य होता है। श्रोतेन्द्रिय, कानों से सुनने की क्रिया, जिह्वा से रस का बोध होता है। इस प्रकार से उन-उन इन्द्रियों से होने वाले ज्ञान की (तत्त्वोद्भव) सृष्टि को तन्मात्रादिक कहा जाता है। आत्मा तन्मात्राण स ? मनः सङ्कल्पलक्षणम्। व्यवसायो बुद्धिभावः प्रज्ञाहङ्कारकौ तथा ॥ 12 ॥ तत्तथा तु तन्मात्रं बुद्धीन्द्रियक्रमस्फुटम्। व्यवसायो बुद्धियोगः प्रज्ञा विकाशकोद्भवा ॥ 13 ॥ अहङ्कारश्च विकृतो रागद्वेषाकुलो ध्रुवम्। पञ्चपित्तोद्भवाश्चैवं आतपकुलसम्भवाः ॥ 14 ॥ आत्मा की तन्मात्रा का ज्ञान सः (वह परमतत्त्व है?), मन की तन्मात्रा सङ्कल्प को तथा बुद्धि की तन्मात्रा व्यवसाय भाव, काम करने का तरीका है, बुद्धि की तन्मात्रा अहङ्कार का भाव है। इन-इन तन्मात्राओं से ही बुद्धि आदि इन्द्रियों का क्रम स्पष्ट हो पाता है। व्यवसाय से बुद्धियोग तथा विकाश से उत्पन्न होता है प्रज्ञा का परिचय। जब अहङ्कार में विकृति होती है, तब राग-द्वेष से दुखी होना तो निश्चित है। आतप या गर्मी के समूह से उत्पन्न होने वाले पाँच पित्त से होने वाले विकार हैं। पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। शब्दः स्पर्शो रसो रूपं गन्धश्च पञ्चकं त्विदम् ॥ 15 ॥