अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकर्मोवाच — पञ्चात्मकं पञ्चसु वर्तमानं षडाश्रयं षड्गुणयोगयुक्तम्। तं सप्तधातुविमलं तं योनिं चतुर्विधं हारमयं शरीरकम्॥ ३॥ विश्वकर्मा बोले — पाँच से पञ्चात्मक वर्तमान में, छह से छह गुणों का योग बनता है। उसी सप्तधातु रूपी विमल को तथा योनि को और चार प्रकार के मनोमय (यष्टि) शरीरों को समझो। पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। पञ्चात्मकमिति प्रोक्तं कथयामि गुणोद्भवन्॥ ४॥ (इस शरीर की रचना में) (1.) पृथ्वी, (2.) जल, (3.) तेज, (4.) वायु और (5.) आकाश— इनको पञ्चात्मक कहा गया है। अब इनसे उत्पन्न गुणों को कहता हूँ। कठिना या सा तु पृथ्वी द्रवाश्चापस्तदुद्भवाः। दीप्तं चत्तद्द्वेत्तेजः चलं तत् पवनात्मकम्॥ ५॥ यच्छिद्रं तु तदाकाशं तेभ्यः सर्वसमुद्भवः। इत्थं पञ्चात्मकं भूतं कथितं हि यथाक्रमम्॥ ६॥ जो कठिन या ठोस है, उसे पृथ्वी कहा गया है, जितने भी द्रव्य पदार्थ है, वे जल से उत्पन्न हुए हैं, जितने भी दीप्त स्वरूप पदार्थ हैं वे तेज या अग्नि से उत्पन्न हैं, जो हलचल या चलिष्णुता है वह पवनात्मक है जबकि जो छिद्र जैसी पोल है, वही आकाश है तथा उस आकाश से ही सब कुछ उत्पन्न या प्रकट हुआ है। इस प्रकार इसी को पञ्चात्मक भूतसृष्टि या पञ्चभूतात्मक सृष्टि कहा गया है, जिसे मैंने यथाक्रम कहा है। पृथिवी धारणं कृत्वा द्रवीकरणं तथैव च। तदुद्भवं तेजः पुञ्जस्तेजत्वेषु समुद्भवे ?॥ आकाशस्याधिकारश्च पञ्चात्मकःस्यादनुक्रमात् ?। अब पृथ्वी द्वारा धारण किए गए गुण, जल से द्रवीकरण वाले गुण तेज से प्रकट होने वाले गुण, वायु से होने वाले गुण और आकाश के अधिकार में रहने वाले गुण के पञ्चात्मक को अपने अनुक्रम से कहता हूँ। स्पर्शो रसश्च रूपं च गन्धः शब्दश्च पञ्चमः॥ 7॥ जिह्वयां रस आयाति स्वादस्यैव च कारणम्। रूप च चक्षुषांश्चैव गन्धो घ्राणात् तथा मतः॥ 8॥