अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-१० 45 तत्र शम्भुमहादेवो ह्यव्यक्तं परमं पदम्। प्राचीना च भवेन्मूर्तिः सूर्यतेजरसमुद्भवा ॥ २१ ॥ यहाँ पर सभी प्रकार के रत्न जैसे हीरा, वैदूर्य, गोमेद, पुष्पराग, इन्द्रनील आदि सब द्वादश आदित्यों के तेज से युक्त और करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशयमान हैं। यहीं पर महादेव शम्भू अव्यक्त रूप से परमपद में अवस्थित है और यह मूर्ति अति प्राचीन है जो सूर्य के तेज से समुद्भूत हुई है। ब्रह्मविष्णु ततो जातौ संसारसृष्टिकोद्भवौ। ब्रह्मतेजस्समुत्पन्नः काश्यपो मुनिपुङ्गवः ॥ २२ ॥ सृष्टिस्तदुद्भवा त्वेवं जगत्स्थावरजङ्गमम्। चतुर्विधो भूतग्रामः पृथक् पृथक् शरीरिणाम् ॥ २३ ॥ इन्हीं शम्भू से ब्रह्मा और विष्णु का जन्म हुआ है जो संसार की सृष्टि के उद्भव के कारक हैं। ब्रह्मा के तेज से मुनि पुङ्गव काश्यप उत्पन्न हुए। उन्हीं से यह सृष्टि उद्भूत हुई है जिसमें स्थावर-जङ्गम जगत बना और चार प्रकार के प्राणी समूह अलग-अलग देहधारण किए उत्पन्न हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां भूराज्यनिवेशनाधिकारो नाम नवमं सूत्रम् ॥ ९ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भू राज्य निवेशन अधिकार नामक नवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ९ ॥ संसारभूतग्रामोत्पत्तिपञ्चतत्त्वनिर्णयो नाम दशमं सूत्रम् ॥ १० ॥ अपराजित उवाच - केनोत्पत्तिः समस्तानां भूतानां च तथालयः। केनासौ कलते कालो लयं यान्ति च सर्वशः ॥ १॥ केनासौत्र नाति कालन्यानास्यासः ? वद प्रभो। ज्ञानं तनु युक्तोद्रव्यं पश्यन्ते च परस्परं विदुः ? ॥ २ ॥ अपराजित बोले- संसार में समस्त भूत प्राणियों की और उनके आवास की उत्पत्ति किसके द्वारा हुई तथा किसके द्वारा यह काल-कलित हो रहा है ? किसके द्वारा ये सब पूरी तरह से विलीन होकर मिट जाते हैं ? यहाँ कौन ऐसे हैं जो काल से भी प्रभावित नहीं होते ? ऐसे ज्ञान स्वरूप तन युक्त द्रव्य को जो परम विद्वान परस्पर देखते हैं, उनके विषय में हे प्रभु ! आप कुछ कहिए।