भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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मेर्वावृत्त्या प्रदक्षिण्यै रम्यको मुक्तिभूतल । मेरोश्च पुरतो भागे इलाख्यः केतुमालिका ॥ 14 ॥ दक्षे हरिर्भारतश्च किम्पुरुषश्च पुष्करे। अब्ध्यन्तः कुरुभद्राश्वौ मेरोश्चैवोत्तरे स्थिताः ॥ 15 ॥ मेरु के घेरे में दक्षिण की ओर भूतल पर मुक्ति का रम्यक धाम है। मेरु के अग्रभाग (पूर्व) में इला नामक केतुमालिका है। मेरु के दक्षिण में हरिभारत, किम्पुरुष और पुष्कर हैं। मेरु के उत्तर भाग में स्थित समुद्र के अन्त तक फैले हुए कुरु और भद्राश्व प्रदेश हैं। तत्रैव गन्धर्वविद्याधराक्षनिवासिनामाह — मेरुवृत्ताङ्गे दक्षिणे रम्यकस्योर्ध्वमालिका। गन्धर्वनगरी रम्या नाम्ना गन्धर्वमालिनी ॥ 16 ॥ विद्याधरास्तदूर्ध्वे तु यक्षाश्चैवं तदूर्ध्वतः । तदूर्ध्वं वैदेवाः ख्याता देवाश्चैवं तदूर्ध्वतः ॥ 17 ॥ इसी प्रकार मेरु के