भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-१४ 63 प्रविष्टा पद्मनालेऽपि सूर्यपीठे लयं गता। संस्थिता कामरूपान्ते सूर्येन्दुग्रहणे रता ॥ ४ ॥ विश्वकर्मा कहने लगे — ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् ब्रह्माण्ड की पोल में चन्द्रमा स्थित है और अग्नि के बीच में रवि या सूर्य विद्यमान है तथा जिसे कामाख्य निलय कहते हैं वह चन्द्र के पीठ के पीछे संस्थित है। पद्मनाल में प्रवेश करने पर भी वह सूर्य के पीछे ही लय हो गई। जब सूर्य और चन्द्र ग्रहण में रत होते हैं, तब उन्हें कामरूपान्त में संस्थित कहा जाता है। रविचन्द्रयुते काले शक्तिः सङ्क्रमते यदा। तत्काले ग्रहणं प्रोक्तं सङ्क्रान्तिर्विष्णुसम्भवा ॥ ५ ॥ ग्रहणान्ते पराशक्तिः पद्मतन्तुनिभा स्थिता। सृजति स्वेच्छया कामः भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥ ६ ॥ रवि-चन्द्र की युति होने के समय जब शक्ति का सङ्क्रमण होता है, उस समय को ग्रहण कहा जाता है और इससे सङ्क्रान्ति तो विष्णु से ही सम्भव होती है। ग्रहण के अन्त में पराशक्ति पद्मतन्तु के समान स्थित रहकर अपनी स्वयं की इच्छा से काम का सृजन करती है जिससे चार प्रकार के भूतग्राम अर्थात् प्राणियों के समूह उत्पन्न होते हैं। कर्मकर्तृमणिर्बन्धुः करहीनाऽपि कर्षति। सृजति ज्ञानतस्तद्वच्चक्षुर्हीना जगत्त्रयम् ॥ ७ ॥ भ्रामको(की) भ्रामयेद् बन्धूः करहीनोऽपि भागशः ?। सृष्टिमार्गस्थिता शक्तिः करहीना करोति च ॥ ८ ॥ कर विहीन होने पर भी यह काम करने वाली कलाई (मणिबन्ध) पकड़कर खींचती है और चक्षु विहीन होने पर भी चक्षु वाले की तरह ज्ञान से ही तीनों लोकों की रचना कर देती है। यही भ्रामकी सभी बन्धुओं को स्वयं कर हीन होने पर भी उनकी कलाई पकड़कर भ्रामती, नचाती है। इस तरह यह पराशक्ति कर हीन होने पर भी अपने सृष्टि मार्ग पर चलती हुई सृष्टि की रचना करती है।¹ चन्द्रः कोऽपि मणिर्बद्धो नष्टचन्द्रः प्रमुञ्चति ?। मुखहीना तथा शक्तिर्वाङ्मयं दर्शयेत् खलु ॥ ९॥

  1. तथा चौपनिषद्वाक्यम्- 'अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः' — वे परमात्मा हाथ- पैरों से रहित होने पर भी ग्रहण करने में समर्थ और वेगपूर्वक चलने वाले हैं। वे नेत्रों के बिना ही देखते हैं और कानों के बिना ही सुनते हैं। (श्वेताश्वतरोपनिषद् 3, 19)