अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें64 अपराजितपृच्छा अद्रवाऽपि द्रावयति यत्किञ्चित्काञ्चनादिकम्। ज्ञानशक्तिस्तथा चैवं निद्रवेत्सृष्टितोऽम्बरम् ॥ 10 ॥ इसी तरह वह किसी चन्द्र को भी उनकी कलाई पकड़कर छुड़ाती है। यह पराशक्ति मुखहीन होने पर भी समस्त वाङ्मय साहित्य-शास्त्रादि को कहकर प्रकट करती है। यह पराशक्ति स्वयं अद्रवा होने पर भी काञ्चनादि जो कुछ भी धातुएँ हैं, उनको द्रवित करती हैं, पिघलाती है। यह पराशक्ति ही अपनी सृष्टि से समस्त ज्ञानशक्ति को आकाश में प्रसारित करती है। अग्नितेजोगुणा यद्वत् सूर्यरश्मिगुणा यथा। रवेरिव गुणास्तद्वत् सहजाः शक्तिसंस्थिताः ॥ 11 ॥ निर्गुणाऽपि गुणैर्युक्ता रूपहीनाऽपि रूपिणी। सञ्चरेत्पादहीनाऽपि कर्णहीना श्रृणोति च ॥ 12 ॥ जिघ्रति घ्राणहीनाऽपि वक्त्रहीनाऽपि जल्पति। चक्षुर्हीना लोकते च त्रैलोक्यं च करस्थितम् ॥ 13 ॥ जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों के साथ गुण का सम्बन्ध है, उसी प्रकार अग्नि का अपने तेज से गुण-सम्बन्ध है। रवि के समान ही सभी गुण उसी तरह शक्ति के साथ सहज ही स्थित है। यह पराशक्ति निर्गुणा होने पर भी गुणों के साथ है और रूप हीन होते हुए भी रूपवती है। यह पाँव विहीन होने पर भी चलती है और कानों के नहीं होने पर सुनती है। यह नासिका से विहीन होने पर भी सूंघती है और मुख हीन होने पर भी बोलती है। चक्षुहीना होकर भी यह देखती है और सारे तीनों लोक उसके कर-कमलों में स्थित है।¹ एवं सा सर्वरूपस्था ह्यमूर्ता मूर्तिचारिणी। पराशक्तिरितिख्याता ह्येका त्रैकोल्यनायिका ॥ 14 ॥ एषा सा परमा शक्तिरिच्छाज्ञानक्रियात्मिका। पृथगेकाष्टकैर्युक्ता ह्यज्ञानां ज्ञानदा स्मृता ॥ 15 ॥ इस प्रकार वह पराशक्ति सभी रूपों में स्थित होकर अमूर्त होने पर भी मूर्ति रूप में चलने वाली है इसीलिए तो इसे पराशक्ति नाम से विख्यात किया जाता है १. तथा च गीतायां— सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ (13, 13-14) गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है—बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥ (रामचरितमानस 1, 118, 3-4)