अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र- १४ 65 जो तीनों लोकों— स्वर्गलोक, मर्त्यलोक व पाताललोक की नायिका अकेली एकछत्रा रूप में है। इस तरह की यह परमशक्ति इच्छा, ज्ञान और क्रियात्मिका है। यही पराशक्ति पृथक्-पृथक् अठारह रूपों से युक्त होकर ही सब अज्ञानियों को ज्ञान देने वाली मानी गई है। अनेकभाविकं कर्म दग्धबीजमिवाम्भसि। भविष्यदपि संरुद्धं ज्ञानकं भुवि गोचरम्॥ 16 ॥ सहजं भोगजं कर्मानर्गलं भविष्यत्तथा। शक्तित्रयविभागेन दद्यात् सर्वं शुभाशुभम् ॥ 17 ॥ अनेक भावों से उत्पन्न कर्म भी इस पराशक्ति की कृपा से वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे जले हुए बीजों को अङ्कुरण के अर्थ में जल से सींचना व्यर्थ है। इस महामाया की कृपा से बन्धे और अवरुद्ध कार्य भी होने लगते हैं और ऐसे दिखने लगते हैं मानो ये पहले ही हमारे ज्ञान में हों और हमें गोचर होते रहे हों। इस पराशक्ति की कृपा से जन्म के साथ उत्पन्न होने वाले तथा पूर्वजन्म के प्रारब्ध, भोग के कारण उत्पन्न होने वाले कर्म भी अनर्गल हो जाते हैं अर्थात् अर्गला, बाधा रहित हो जाते हैं और तीनों ही शक्तियों के विभागानुसार सभी शुभाशुभ फल देने में समर्थ हो जाते हैं।¹ अथ शक्त्याप्रमाणानि — कारणे च क्रियाशक्तिरिच्छाशक्तिः प्रवर्तने। ज्ञानशक्तिस्तथाचारे सञ्चरेत्सचराचरम् ॥ 18 ॥ सर्वाङ्गसन्धिसञ्चारे नखकेशाग्रमध्यके। व्यापिनी संस्थिता देहे रेणुमात्रस्वरूपिणी ॥ 19 ॥ ये शक्तियाँ इस प्रकार हैं— (1.) कारण में क्रियाशक्ति लगती है, (2.) प्रवर्तन या चलने में, बढ़ने में इच्छाशक्ति लगती है और (3.) आचरण में ज्ञानशक्ति लगती है। इस तरह ये तीनों ही शक्तियाँ समस्त चराचर जगत में सञ्चरित होती है। देह के सभी अङ्गों के सञ्चारण के लिए, सभी सन्धियों को गति देने के लिए जैसे नख व केश के अग्रभाग में, मध्यभाग में भी सञ्चरण के लिए यह पराशक्ति रेणु- मात्र स्वरूप की होकर समस्त देह में स्थित रहती है। १. तथा च श्रीमद्भगवद्गीतायां— अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ (13, 17) पुराणेऽपि— सृष्टिस्थित्यन्तकरणाद् ब्रह्माविष्णुशिवात्मकः। स सञ्ज्ञां याति भगवान्एक एव जनार्दनः॥ (पद्मपुराण सृष्टिखण्ड 2, 114)