भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 535 में से

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बीजरूपा तु सा देवी जगन्माता व्यवस्थिता। तां ज्ञात्वा मुच्यते पाशैस्सर्वज्ञस्तु नरो भवेत् ॥ 20 ॥ क्रियेच्छयोस्तथा ज्ञाने त्रिकरूपे व्यवस्थिता। प्रातर्यस्तु प्रबुद्धात्मा विन्द्यात् शक्तिपतिं तु सः ॥ 21 ॥ यह पराशक्ति बीज रूपा होकर ही जगन्माता के रूप में व्यवस्थित है। इस जगन्माता को ही सही-सही जान लेने पर सभी पाशों से मुक्ति मिल जाती है और इस प्रकार जान लेने वाला व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। क्रियाशक्ति, इच्छाशक्ति और ज्ञानशक्ति के इस त्रिक् रूप व्यवस्था से वह सर्वज्ञ प्रबुद्धात्मा भवसागर को तैर जाता है और शक्तिपति को पाने का अधिकारी हो जाता है। एवं शारीरिकं चक्रं शक्तित्रयसमन्वितम्। शक्त्यन्ते च शिवं विद्याद्यो दशान्ते कलौर्विना ? ॥ 22 ॥ इस प्रकार उक्त तीनों शक्तियों¹ के समन्वय को पाया हुआ यह शारीरिक चक्र शक्ति को जान लेने के अन्त में शिवतत्त्व को जान लेता है और इस तरह भवदशा के अन्त में बिना किसी कलह (कला ?) के भवसागर से तर जाता है, उसका मोक्ष हो जाता है।¹ एकः शिवः परं ब्रह्मपदमेव निराश्रयम्। पश्येत् संसारबीजं यो रम्भास्तम्भपुटं यथा ॥ २३ ॥ यस्य शिवशक्तिज्ञानं तस्य मुक्तिर्विधीयते। शक्तित्रयविमुक्तस्य भुक्तिर्मुक्तिविमोचनम् ॥ 24 ॥ दर्पणेषु यथा छाया पिण्डः पिण्डाकृतिर्भवेत्। तथा सर्वगतः शम्भुर्द्दश्यते जलचन्द्रवत् ॥ 25 ॥ एक ही शिव परम ब्रह्मपद है और वह निराश्रय है अर्थात् वह किसी के सहारे से नहीं है। जो इस संसार-बीज रूप शिव को केले के स्तम्भ की परतों की तरह देख लेता है, उसे ही शिव-शक्ति का ज्ञान प्राप्त कहा जाता है और उसकी मुक्ति निश्चित विधि के अनुसार हुई मानी जाती है क्योंकि शक्तित्रय के द्वारा हुए विमुक्त नर की प्रारब्ध भुक्ति भी और मुक्ति भी विमोचन को प्राप्त हो जाती है अर्थात् भुक्ति- मुक्ति भी छूट जाती है। उदाहरण के लिए जैसे दर्पण में अपनी परछाईं भी पिण्ड शरीर की आकृति जैसी दिखाई पड़ती है, उसी तरह ऐसे जीवन्मुक्त पुरुष को समस्त चराचर में शिव ही दिखाई देते हैं; यह दर्शन जल की उर्मियों पर सर्वत्र चन्द्र ही चन्द्र की भाँति दृष्टिगोचर होता है।

  1. तथा च— इच्छाज्ञानक्रियारूपास्त्रिशूलं शक्तयो मताः। उक्तास्ता एव खट्वाङ्गं शुद्धसत्त्वप्रवर्तिकाः ॥
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