अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र- १५ 67 स्वयं देवी स्वयं देवः स्वयं शिष्यः स्वयं गुरुः । स्वयं ध्यानं स्वयं धाता स्वयमेव परात्परम् ॥ २६ ॥ यत्र यत्र मनो याति ( यायात् ) तत्र तत्र परः शिवः । वेदो वेद्यं जपो मौनमाचारः प्रार्थना क्रिया ॥ २७ ॥ व्रतं स्नानं तीर्थयात्रा चोपवास्यं त्रिरात्रिकम् । इत्येतदाश्रयस्थानं मुक्तिस्थानं निराश्रयम् ॥ २८ ॥ ( इससे निष्कर्ष यह हुआ कि 'सोऽहं' का जाप करने वाला पराशक्ति को पाकर शिवतत्त्व को पा लेता है जिसमें) वह स्वयं को देवी तथा स्वयं को देव, स्वयं को शिष्य और स्वयं को गुरु, स्वयं को ध्यान और स्वयं को ध्यान करने वाला जानकर स्वयं को ही परात्परम् परमात्मा जान लेता है। ऐसी अवस्था में जहाँ-जहाँ उसका मन जाता है, वहाँ-वहाँ उसे परम शिव के ही दर्शन होते हैं और उसे समस्त वेद जाने हुए हो जाते हैं और उसके समस्त जप भी मौन में समा जाते हैं। उसके समस्त आचार-व्यवहार ही उसकी प्रार्थना की क्रिया बन जाती है। इस संसार के भवसागर में व्रत, स्नान, तीर्थयात्रा, उपवास, त्रिरात्रिक जपादि सब आश्रय के स्थान है, परन्तु जीवन्मुक्त को प्राप्त मुक्तिस्थान ही एक मात्र निराश्रय है अर्थात् स्वतन्त्र है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शिवशक्तिब्रह्मज्ञानाधिकारो नाम चतुर्दश सूत्रम् ॥ 14 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शिव शक्ति ब्रह्मज्ञान अधिकार नामक चौदहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 14 ॥ गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनार्थं पञ्चदशं सूत्रम् ॥ 15 ॥ अपराजित उवाच — बीजरूपा कथं जाता वृद्धिंयाता परेश्वर । क्रियाशक्तिः कथं भूता बीजयोनिरथाम्भसि ॥ 1 ॥ अपराजित बोले — हे परमेश्वर ! यह प्राणी बीज रूप में कैसे जन्म लेता है, जन्म के बाद वृद्धि को कैसे प्राप्त करता है ? इस प्राणी में क्रियाशक्ति कैसे होती है जो कि बीज योनि को जैसे जल से सींचने पर बीज बढ़ता है, वैसे ही बढ़ती है। गुरुमार्गाः कथं प्रोक्ताः कुलाकुलोभयोद्भवाः ? । कथयस्व महाभाग मम भ्रान्तिहरं प्रभो ॥ 2 ॥ इसी प्रकार गुरु प्रदर्शित मार्ग किसे कहते हैं और कुल व अकुल इस भव में