अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें68 अपराजितपृच्छा उद्भव करने वाले क्या हैं ? हे महाभाग ! यह सब ठीक-ठीक कहकर हे प्रभो, मेरी भ्रान्ति को दूर करें। विश्वकर्मोवाच — वटो यथा च बीजस्थस्तथा शुक्रगता तनुः । सङ्घाटे काञ्चनं यद्वत् क्रियादीपेन दृश्यते ॥ ३ ॥ हे वत्स ! जिस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म वट बीज में सम्पूर्ण वट वृक्ष समाया हुआ है उसी प्रकार जीव के शुक्र में उसका समस्त शरीर सम्पूर्ण रूप से समाया हुआ है। जिस प्रकार कञ्चन में स्थित आभूषण का घड़ा गया रूप क्रिया अर्थात् घड़ाई रूपी दीप से दिखाई पड़ता है, वैसे यह सब है। क्रियामाध्यात्मिकीं विद्यात् क्रियाशक्तेरनुक्रमात् । देहस्थं दीपकं दिव्यं शक्तिरूपण बोधितम् ॥ ४ ॥ तेन बोधितमात्रेण पश्यन्ति भुवनत्रयम् । त्रैलोक्यदीपकं दिव्यं तत्त्वद्योतकरं परम् ॥ ५ ॥ प्राणी की क्रिया शक्ति को आध्यात्मिक समझा जाता है। इसी क्रियाशक्ति के अनुक्रम से बढ़ते-बढ़ते देह में स्थित दिव्य दीपक प्रज्वलित हो जाता है, उसे ही शक्ति रूप से समझा जाता है। यह समझ में आते ही तीनों लोकों के चराचर जगत के प्राणी समूहों का ज्ञान से स्पष्ट दर्शन होने लगता है। इस तरह यह ज्ञान, तत्त्व को प्रकाशित करने वाला परम दिव्य त्रैलोक्य दीपक स्वरूप है। मूढात्मानो न बुध्यन्ति गुरुमार्गविवर्जिताः । गुरुवक्त्रे स्थितं तत्त्वं प्राप्यते तत्प्रसादतः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु । इस तत्त्व को गुरुमार्ग पर नहीं चलने वाले मूढ़ लोग नहीं समझ सकते क्योंकि यह परम तत्त्व तो गुरुदेव के मुख में ही स्थित होता है और वह गुरु की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए यह तत्त्व प्राप्त करने के लिए सभी प्रयत्नों से गुरुदेव की आराधना करो। गुरुपूजननिर्देशमाह — गुरुपूजा प्रकर्त्तव्यागन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ ७ ॥ पुष्पधूपैश्च नैवेद्यैर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गृहक्षेत्रपुरग्रामैर्गजाश्वशयनासनैः ॥ ८ ॥