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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 535 में से

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सूत्र- १५ ६९ तस्मात् पूजा प्रकर्तव्या ह्यात्मना च धनेन च। गुरुदेव की पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षतादि से करनी चाहिए। गुरु पूजार्थ पुष्प, धूप, नैवेद्य, वस्त्रालङ्कार, गृह, खेत, नगर, ग्राम, हाथी-घोड़े, शयन-आसनों को समर्पित करना चाहिए। उन्हें यह सब भेंट में अर्पण करना चाहिए। इसलिए गुरुतत्त्व प्राप्ति के लिए स्वयं अपने आपको और धनादि को समर्पण करके गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए। गुरुमाहात्म्यमाह — गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत् ॥ 9 ॥ यावत्कालं भवेद्देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्। गुरुर्माता पिता देवो गुरुर्ज्ञानं कुलाकुलम् ॥ 10 ॥ गुरु का लोप कभी नहीं करना चाहिए अर्थात् कभी भी गुरु विहीन नहीं रहना चाहिए। यदि कभी ऐसा अवसर भी आ जाए कि गुरु से दूर, स्वच्छन्द, अकेला रहना पड़े तो भी जब तक इस देह से जीवित रहो, तब तक गुरुदेव का सदा स्मरण करते रहो क्योंकि गुरुदेव ही माता, पिता, देव और सर्वस्व है, कुल और अकुल का बोधक भी गुरुज्ञान ही है। यस्यैवं संस्थितो भावस्तस्य देवसमं कुलम्। आसनं शयनं यानं मणिकाञ्चनभूषणम् ॥ 11 ॥ साधकेन न कर्तव्यं गुरो ( वै ) चाधिकं ननु। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि जिस देव के प्रति आपका भाव दृढ़ता से संस्थित हो गया हो, उसी देव के समान कुल के आप हो जाते हैं। साधक को चाहिए कि वह अपने आसन, शयन, यान तथा मणिकाञ्चन, आभूषणादि को किसी भी प्रकार से गुरु से अधिक महत्व न दें। गुरु के सामने अपना वैभव प्रदर्शन नहीं करें। गुरोः शय्यासने यानं पादुकोपानहौ पदम् ॥ 12 ॥ स्नानोदकं तथाच्छायां लङ्घयेन्न कदाचन। कर्मणा मनसा वाचा यैश्च नाराधितो गुरुः ॥ 13 ॥ तस्माद् ज्ञानं महारत्नमत्यन्तं गूढतां गतम्। योगिनी शाकिनी कर्म ? यस्य भक्तिस्तु निश्चला ॥ 14 ॥ गुरुदेव की शय्या, आसन, यान, पादुका, पनही-पगरखी, चरणचिह्न, स्नान का जल तथा गुरुदेव के शरीर की परछाई को कभी नहीं लांघना चाहिए क्योंकि जिसने

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