भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 535 में से

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पृष्ठ 119

70 अपराजितपृच्छा मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु तत्त्व की आराधना की है अर्थात् उसके लिए यह परम कर्तव्य है। इस तरह जिस साधक की गुरुतत्त्व में निश्चला, अडिग भक्ति है, वह योगिनी, शाकिनी क्रम के अत्यन्त गूढ़ता को पहुँचे हुए ज्ञान महारत्न का अधिकारी हो जाता है। तस्य प्रवर्तते शीघ्रं निर्वाणं परमं पदम्। इत्थं समययुक्त्या च गुरुभक्तो यतेन्द्रियः ॥ 15 ॥ दृढचित्तेन चादद्याद् ज्ञानं त्रैलोक्यपूजितम्। मूलसूत्रमहारत्नं रत्नपीठविनिर्गतम् ॥ 16 ॥ ऐसा साधक शीघ्र ही निर्वाण के परमपद की ओर अग्रसर हो जाता है। यही यतेन्द्रिय गुरुभक्त के लिए युक्त समय समझना चाहिए और वह दृढ़चित्त से साधना करने से प्राप्त इस ज्ञान के बल पर त्रैलोक्य पूजित हो जाता है। यह ज्ञान मूलसूत्र रूपी महारत्न है जो गुरुतत्त्व रूपी रत्नपीठ से निकला हुआ समझना चाहिए। सारभूतं महातत्त्वं मुक्तिमार्गप्रकाशकम्। आदेयं गुरुभक्ताय वज्रकपाटमुत्तमम् ॥ 17 ॥ यही सारतत्त्व, महातत्त्व है जो मुक्तिमार्ग को प्रकाशित करने वाला है और गुरुभक्त को गुरुदेव के द्वारा दिया गया, उसकी रक्षा करने वाला, सर्वोत्तम वज्रकपाट रूप से मिला हुआ तत्त्वज्ञान है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनाधिकारो नाम पञ्चदश सूत्रम् ॥ 15 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गीता सद्भाव अपरनाम अपराजितबोध अधिकार नामक पन्द्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 15 ॥ सत्वरजस्तमः षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ अपराजित उवाच - सत्त्वं रजस्तमः कीदृक् कथं तेषां समुद्भवः। संसारस्य समस्तस्य जननी जगमालिनी ? ॥ 1 ॥ समुद्भूता कथं देव संसारसृष्टिमालिका। सत्त्वं रजस्तमश्चैवं कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥ अपराजित बोले – सत्व, रज और तम (गुण) क्या हैं? इनका उद्भव कैसे होता है? इस समस्त संसार की जननी इन्हीं सत्व, रज, तम की शृङ्खला ही है? हे

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