अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र- १५ 67 स्वयं देवी स्वयं देवः स्वयं शिष्यः स्वयं गुरुः । स्वयं ध्यानं स्वयं धाता स्वयमेव परात्परम् ॥ २६ ॥ यत्र यत्र मनो याति ( यायात् ) तत्र तत्र परः शिवः । वेदो वेद्यं जपो मौनमाचारः प्रार्थना क्रिया ॥ २७ ॥ व्रतं स्नानं तीर्थयात्रा चोपवास्यं त्रिरात्रिकम् । इत्येतदाश्रयस्थानं मुक्तिस्थानं निराश्रयम् ॥ २८ ॥ ( इससे निष्कर्ष यह हुआ कि 'सोऽहं' का जाप करने वाला पराशक्ति को पाकर शिवतत्त्व को पा लेता है जिसमें) वह स्वयं को देवी तथा स्वयं को देव, स्वयं को शिष्य और स्वयं को गुरु, स्वयं को ध्यान और स्वयं को ध्यान करने वाला जानकर स्वयं को ही परात्परम् परमात्मा जान लेता है। ऐसी अवस्था में जहाँ-जहाँ उसका मन जाता है, वहाँ-वहाँ उसे परम शिव के ही दर्शन होते हैं और उसे समस्त वेद जाने हुए हो जाते हैं और उसके समस्त जप भी मौन में समा जाते हैं। उसके समस्त आचार-व्यवहार ही उसकी प्रार्थना की क्रिया बन जाती है। इस संसार के भवसागर में व्रत, स्नान, तीर्थयात्रा, उपवास, त्रिरात्रिक जपादि सब आश्रय के स्थान है, परन्तु जीवन्मुक्त को प्राप्त मुक्तिस्थान ही एक मात्र निराश्रय है अर्थात् स्वतन्त्र है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां शिवशक्तिब्रह्मज्ञानाधिकारो नाम चतुर्दश सूत्रम् ॥ 14 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में शिव शक्ति ब्रह्मज्ञान अधिकार नामक चौदहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 14 ॥ गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनार्थं पञ्चदशं सूत्रम् ॥ 15 ॥ अपराजित उवाच — बीजरूपा कथं जाता वृद्धिंयाता परेश्वर । क्रियाशक्तिः कथं भूता बीजयोनिरथाम्भसि ॥ 1 ॥ अपराजित बोले — हे परमेश्वर ! यह प्राणी बीज रूप में कैसे जन्म लेता है, जन्म के बाद वृद्धि को कैसे प्राप्त करता है ? इस प्राणी में क्रियाशक्ति कैसे होती है जो कि बीज योनि को जैसे जल से सींचने पर बीज बढ़ता है, वैसे ही बढ़ती है। गुरुमार्गाः कथं प्रोक्ताः कुलाकुलोभयोद्भवाः ? । कथयस्व महाभाग मम भ्रान्तिहरं प्रभो ॥ 2 ॥ इसी प्रकार गुरु प्रदर्शित मार्ग किसे कहते हैं और कुल व अकुल इस भव में
68 अपराजितपृच्छा उद्भव करने वाले क्या हैं ? हे महाभाग ! यह सब ठीक-ठीक कहकर हे प्रभो, मेरी भ्रान्ति को दूर करें। विश्वकर्मोवाच — वटो यथा च बीजस्थस्तथा शुक्रगता तनुः । सङ्घाटे काञ्चनं यद्वत् क्रियादीपेन दृश्यते ॥ ३ ॥ हे वत्स ! जिस प्रकार सूक्ष्मातिसूक्ष्म वट बीज में सम्पूर्ण वट वृक्ष समाया हुआ है उसी प्रकार जीव के शुक्र में उसका समस्त शरीर सम्पूर्ण रूप से समाया हुआ है। जिस प्रकार कञ्चन में स्थित आभूषण का घड़ा गया रूप क्रिया अर्थात् घड़ाई रूपी दीप से दिखाई पड़ता है, वैसे यह सब है। क्रियामाध्यात्मिकीं विद्यात् क्रियाशक्तेरनुक्रमात् । देहस्थं दीपकं दिव्यं शक्तिरूपण बोधितम् ॥ ४ ॥ तेन बोधितमात्रेण पश्यन्ति भुवनत्रयम् । त्रैलोक्यदीपकं दिव्यं तत्त्वद्योतकरं परम् ॥ ५ ॥ प्राणी की क्रिया शक्ति को आध्यात्मिक समझा जाता है। इसी क्रियाशक्ति के अनुक्रम से बढ़ते-बढ़ते देह में स्थित दिव्य दीपक प्रज्वलित हो जाता है, उसे ही शक्ति रूप से समझा जाता है। यह समझ में आते ही तीनों लोकों के चराचर जगत के प्राणी समूहों का ज्ञान से स्पष्ट दर्शन होने लगता है। इस तरह यह ज्ञान, तत्त्व को प्रकाशित करने वाला परम दिव्य त्रैलोक्य दीपक स्वरूप है। मूढात्मानो न बुध्यन्ति गुरुमार्गविवर्जिताः । गुरुवक्त्रे स्थितं तत्त्वं प्राप्यते तत्प्रसादतः ॥ ६ ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु । इस तत्त्व को गुरुमार्ग पर नहीं चलने वाले मूढ़ लोग नहीं समझ सकते क्योंकि यह परम तत्त्व तो गुरुदेव के मुख में ही स्थित होता है और वह गुरु की कृपा से ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए यह तत्त्व प्राप्त करने के लिए सभी प्रयत्नों से गुरुदेव की आराधना करो। गुरुपूजननिर्देशमाह — गुरुपूजा प्रकर्त्तव्यागन्धपुष्पाक्षतादिभिः ॥ ७ ॥ पुष्पधूपैश्च नैवेद्यैर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गृहक्षेत्रपुरग्रामैर्गजाश्वशयनासनैः ॥ ८ ॥
सूत्र- १५ ६९ तस्मात् पूजा प्रकर्तव्या ह्यात्मना च धनेन च। गुरुदेव की पूजा गन्ध, पुष्प, अक्षतादि से करनी चाहिए। गुरु पूजार्थ पुष्प, धूप, नैवेद्य, वस्त्रालङ्कार, गृह, खेत, नगर, ग्राम, हाथी-घोड़े, शयन-आसनों को समर्पित करना चाहिए। उन्हें यह सब भेंट में अर्पण करना चाहिए। इसलिए गुरुतत्त्व प्राप्ति के लिए स्वयं अपने आपको और धनादि को समर्पण करके गुरुदेव की पूजा करनी चाहिए। गुरुमाहात्म्यमाह — गुरुलोपो न कर्तव्यः स्वच्छन्दो यदि वा भवेत् ॥ 9 ॥ यावत्कालं भवेद्देहस्तावदेव गुरुं स्मरेत्। गुरुर्माता पिता देवो गुरुर्ज्ञानं कुलाकुलम् ॥ 10 ॥ गुरु का लोप कभी नहीं करना चाहिए अर्थात् कभी भी गुरु विहीन नहीं रहना चाहिए। यदि कभी ऐसा अवसर भी आ जाए कि गुरु से दूर, स्वच्छन्द, अकेला रहना पड़े तो भी जब तक इस देह से जीवित रहो, तब तक गुरुदेव का सदा स्मरण करते रहो क्योंकि गुरुदेव ही माता, पिता, देव और सर्वस्व है, कुल और अकुल का बोधक भी गुरुज्ञान ही है। यस्यैवं संस्थितो भावस्तस्य देवसमं कुलम्। आसनं शयनं यानं मणिकाञ्चनभूषणम् ॥ 11 ॥ साधकेन न कर्तव्यं गुरो ( वै ) चाधिकं ननु। यह भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि जिस देव के प्रति आपका भाव दृढ़ता से संस्थित हो गया हो, उसी देव के समान कुल के आप हो जाते हैं। साधक को चाहिए कि वह अपने आसन, शयन, यान तथा मणिकाञ्चन, आभूषणादि को किसी भी प्रकार से गुरु से अधिक महत्व न दें। गुरु के सामने अपना वैभव प्रदर्शन नहीं करें। गुरोः शय्यासने यानं पादुकोपानहौ पदम् ॥ 12 ॥ स्नानोदकं तथाच्छायां लङ्घयेन्न कदाचन। कर्मणा मनसा वाचा यैश्च नाराधितो गुरुः ॥ 13 ॥ तस्माद् ज्ञानं महारत्नमत्यन्तं गूढतां गतम्। योगिनी शाकिनी कर्म ? यस्य भक्तिस्तु निश्चला ॥ 14 ॥ गुरुदेव की शय्या, आसन, यान, पादुका, पनही-पगरखी, चरणचिह्न, स्नान का जल तथा गुरुदेव के शरीर की परछाई को कभी नहीं लांघना चाहिए क्योंकि जिसने
70 अपराजितपृच्छा मनसा, वाचा, कर्मणा गुरु तत्त्व की आराधना की है अर्थात् उसके लिए यह परम कर्तव्य है। इस तरह जिस साधक की गुरुतत्त्व में निश्चला, अडिग भक्ति है, वह योगिनी, शाकिनी क्रम के अत्यन्त गूढ़ता को पहुँचे हुए ज्ञान महारत्न का अधिकारी हो जाता है। तस्य प्रवर्तते शीघ्रं निर्वाणं परमं पदम्। इत्थं समययुक्त्या च गुरुभक्तो यतेन्द्रियः ॥ 15 ॥ दृढचित्तेन चादद्याद् ज्ञानं त्रैलोक्यपूजितम्। मूलसूत्रमहारत्नं रत्नपीठविनिर्गतम् ॥ 16 ॥ ऐसा साधक शीघ्र ही निर्वाण के परमपद की ओर अग्रसर हो जाता है। यही यतेन्द्रिय गुरुभक्त के लिए युक्त समय समझना चाहिए और वह दृढ़चित्त से साधना करने से प्राप्त इस ज्ञान के बल पर त्रैलोक्य पूजित हो जाता है। यह ज्ञान मूलसूत्र रूपी महारत्न है जो गुरुतत्त्व रूपी रत्नपीठ से निकला हुआ समझना चाहिए। सारभूतं महातत्त्वं मुक्तिमार्गप्रकाशकम्। आदेयं गुरुभक्ताय वज्रकपाटमुत्तमम् ॥ 17 ॥ यही सारतत्त्व, महातत्त्व है जो मुक्तिमार्ग को प्रकाशित करने वाला है और गुरुभक्त को गुरुदेव के द्वारा दिया गया, उसकी रक्षा करने वाला, सर्वोत्तम वज्रकपाट रूप से मिला हुआ तत्त्वज्ञान है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां गीतासद्भावोऽपरेऽपराजितबोधनाधिकारो नाम पञ्चदश सूत्रम् ॥ 15 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में गीता सद्भाव अपरनाम अपराजितबोध अधिकार नामक पन्द्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 15 ॥ सत्वरजस्तमः षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ अपराजित उवाच - सत्त्वं रजस्तमः कीदृक् कथं तेषां समुद्भवः। संसारस्य समस्तस्य जननी जगमालिनी ? ॥ 1 ॥ समुद्भूता कथं देव संसारसृष्टिमालिका। सत्त्वं रजस्तमश्चैवं कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥ अपराजित बोले – सत्व, रज और तम (गुण) क्या हैं? इनका उद्भव कैसे होता है? इस समस्त संसार की जननी इन्हीं सत्व, रज, तम की शृङ्खला ही है? हे
सूत्र-१६ 71 देव! यह संसार की सृष्टि शृङ्खला सत्व, रज, तम की किस प्रकार उत्पन्न हुई, इसके विषय में आप कृपा करके कहिए। विश्वकर्मोवाच — उत्पत्तिर्जगतो हेतुर्निर्मिता किल विष्णुना। स्रष्टा वै सर्वशिल्पाना शङ्खशार्ङ्गादिधारिणा ॥ ३॥ तत्रोद्भूतं रजः सत्त्वं तमश्चापि तृतीयकम्। तदुद्भवा च सृष्टिस्तु जनसन्तानसन्ततिः ॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले — जगत की उत्पत्ति के लिए ही शङ्ख, शार्ङ्गपाणि भगवान् विष्णु ने इन सब सत्व, रज व तम का निर्माण किया है और वे विष्णु ही समस्त शिल्पों के सृष्टा है। श्रीविष्णु भगवान् से ही सत्व, रज और तीसरा तम उत्पन्न हुआ है और इनसे ही सृष्टि की जन सन्तान परम्परा का उद्भव हुआ है। रजो ब्रह्मा तमो विष्णुः सत्त्वं चैव महेश्वरः। ततस्त्रिकं समुत्पन्नं संसारसृष्टिकोद्भवम् ॥ ५॥ इस सृष्टिक्रम में रज ब्रह्मा स्वरूप, तम विष्णु स्वरूप और सत्व महेश्वर रूप है। इस त्रिक् से समस्त संसार की सृष्टि का उद्भव हुआ है। चतुरशीतिलक्षाणि जीवयोनिरनेकधा। तमस्सतामसी शक्तिस्तपस्तेजोविवर्द्धिनी ॥ ६॥ चौरासी लाख की संख्या में अनेक प्रकार की जीव योनियाँ हैं। तम से उत्पन्न होने वाली तामसी शक्ति तप और तेज को बढ़ाने वाली है। रजसो राजसी ख्याता रजो ज्ञाने ब्रह्मात्मजा। माया मोहश्च तत्कार्यं वैष्णवी मोहशालिनी ॥ ७॥ रजस से राजसी शक्ति विख्यात है। वह ब्रह्मात्मजा है और ज्ञान क्षेत्र का वर्द्धन करने वाली है। भगवान् विष्णु से उत्पन्न होने वाली तामसी शक्ति मोहशालिनी है और उसके कार्य माया और मोह है। सत्त्वाच्च सात्त्विकी शक्तिः सत्त्वज्ञाने शिवात्मजा। संसारप्रीतिमुक्तानां मोक्षदा सत्त्वसात्त्विकी ॥ ८॥ सत्त्वगुण से सात्विकी शक्ति शिव से उत्पन्न हुई है और सत्त्वज्ञान का वर्द्धन करने वाली है। यह सत्त्वज्ञान शक्ति संसार की वासनाओं से मुक्तात्माओं को मोक्ष प्रदान करने वाली है।
72 अपराजितपृच्छा तमः पिता रजो माता गुरुः सत्त्वं प्रतिष्ठितम् । एवं प्रवर्तते सृष्टिः संसारे मोहशालिनी ॥ ९ ॥ रजो रक्तं समाख्यातं तमः शुक्रं प्रतिष्ठितम् । सत्त्वं पवन इत्युक्तं संसारे सृष्टिमालिनी ॥ १० ॥ तम पिता के रूप में, रज माता के रूप में और सत्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित है। इस प्रकार इन तीनों से संसार में मोहशालिनी यह सृष्टि प्रवर्तित हुई है। रज रक्त रूप में विख्यात है और तम शुक्र के रूप में प्रतिष्ठित है। सत्व पवन रूप में कहा गया है। इस तरह इस संसार में सृष्टि होने से इन तीनों रज, तम और सत्व की शृङ्खला बनी हुई है। रजः सूर्यः समाख्यातस्तमश्चैवं तु चन्द्रमाः । सत्त्वं पवनमित्याहुः संसारमोघमालिका ॥ ११ ॥ इसी प्रकार रज सूर्य के रूप में विख्यात है और तम चन्द्रमा के रूप में है जबकि पवन के रूप में सत्व है। इससे संसार में अमोघ शृङ्खला चलिष्णु है। रजः पृथ्वी समाख्याता तमश्चाकाशसम्भवम् । सत्त्वं पवनमित्युक्तं वर्तते मोघमालिनी ॥ १२ ॥ पुनः देखें कि रज पृथ्वी कही गई है और तम को आकाश तथा सत्व को पवन कहा गया है। इस तरह यह पवन इस रज-तम की मोघमाला को वर्तता है अर्थात् चलाता है। रज आपस्तथा ख्याता तमस्तेजः समुद्भवम् । सत्त्वं मारुतमित्याहुस्त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १३ ॥ रज जो जल के रूप में विख्यात है और तम अग्नि के रूप में उद्भूत है। सत्व मारुत के रूप में है। इन तीनों से ही यह संसार सम्भव हुआ है। इच्छाशक्ती राजसी स्यात् तामसी तु क्रियात्मिका । सात्त्विकी ज्ञानशक्त्याख्या शम्भुसंसारसम्भवाः ॥ १४ ॥ इच्छा शक्ति को राजसी कहा है और क्रियात्मिका शक्ति को तामसी कहा है जबकि ज्ञानशक्ति को सात्विकी कहा है जो शम्भू स्वरूप है और इन तीनों से ही यह संसार हुआ है अर्थात् यह सृष्टि रचना हुई है। शक्तिरूपे रजः ख्यातं शिवरूपे तमो मतम् । बीजरूपे स्थितं सत्त्वं त्रिभिः संसारसम्भवः ॥ १५ ॥ शक्ति रूप में रज विख्यात है और शिव रूप में तम विख्यात है, ऐसा समझें।
सूत्र- १७ 73 इनमें बीज रूप से सत्व स्थित है। इस प्रकार इन तीनों से इस संसार की उत्पत्ति सम्भव हुई है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सत्त्वरजस्तमोऽधिकारो नाम षोडश सूत्रम् ॥ 16 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सत्व- रज-तम अधिकार नामक सोलहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 16 ॥ ग्रहादिध्रुवमण्डलं सप्तदश सूत्रम् ॥ 17 ॥ अपराजित उवाच - कथं दिनं कथं रात्रिः संसारसृष्टिकोद्भवः । केन साऽऽक्रमते चेत्थं चन्द्रसूर्यभ्रमणे रता ॥ 1 ॥ नक्षत्राणि ग्रहाश्चैव ध्रुवाद्याश्च समस्तकाः । तेषां मृत्युः कथं प्रोक्तः कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥ अपराजित बोले – इस संसार में दिन कैसे उत्पन्न हुआ और रात्रि कैसे हुई और किसके द्वारा इन चन्द्र-सूर्य को भ्रमण कराने में क्रम से शक्ति लगी हुई है ? समस्त ग्रहों, नक्षत्रों और ध्रुवादिक की विलुप्ति कैसे होती है, इसे आप कृपापूर्वक कहिए। विश्वकर्मोवाच – तेजसः काश्यपस्यर्कचन्द्रमृत्युसमुद्भवः । शिवशक्तिसमायोगात् संसारसृष्टिसम्भवः ॥ 3 ॥ शिवः सूर्यः शशी शक्तिः संसारसृष्टिकोद्भवः । दिवाकरः शिवो भूत्वा शशी चैव निशाकरः ॥ 4 ॥ दिवारात्रिसमायोगो योगश्च चन्द्रसूर्ययोः । तेजसो मृत्युसंयोगः संयोगः सृष्टिकारकः ॥ 5 ॥ विश्वकर्मा बोले – काश्यप के तेज से सूर्य-चन्द्र और मृत्यु समुद्भूत हुए। शिव-शक्ति के सहयोग से ही यह सृष्टि सम्भव हुई है। शिव सूर्यरूप है और शक्ति चन्द्ररूप, इन दोनों से सृष्टि उत्पन्न हुई और दिवाकर सूर्य होकर तथा निशाकर शक्ति होकर दिन और रात्रि का समायोग करते हैं। यही योग सूर्य और चन्द्र दोनों का है। इसी तरह तेजस से मृत्यु का संयोग होता है और इस संयोग को सृष्टिकारक भी कहते हैं।
अथ सूर्यचन्द्रवंशानुकीर्तनम् — सूर्यवंशोद्भवाश्चैव चन्द्रवंशोद्भवा नृपाः । प्रवर्तते मही राज्य नृपश्च पृथिवीपतिः ॥ 6 ॥ (प्रारम्भिक वंशों में) सूर्यवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं और चन्द्रवंश में उत्पन्न होने वाले राजाओं ने इस पृथ्वी पर राज्य सञ्चालित किया और पृथिवीपति कहलाए। सूर्यवंशे पृथूराजा बुधः शशिकुलोद्भवः । सूर्यवंशसमृद्धौ तु क्षीयते सोमवंशकः । सोमवंशसमृद्धौ च क्षीयते सूर्यवंशकः ॥ 7 ॥ एकोत्तरशतं यावत् क्षीयते वंशकावुभौ । पृष्ठोरुस्पर्शभूतश्च सम्प्रवेत दूंसाधिपः ? ॥ 8 ॥ सूर्यवंश में राजा पृथु हुए और चन्द्रवंश में बुध राजा हुए। इस तरह जब-जब सूर्यवंश समृद्ध हुआ तब-तब चन्द्रवंश क्षीण हुआ और जब चन्द्रवंश समृद्ध हुआ तो सूर्यवंश क्षीण हुआ। इन दोनों ही वंशों में एक सौ एक वंशज जब तक क्षय होते हैं, तब उनके पीछे, उरुस्पर्शभूत अर्थात् अन्य वंशों के विकास के साथ-अन्य नए वंशाधिपति राजा होते हैं। ब्रह्मापुत्रो मरीचिश्च तज्जातः कश्यपो मुनिः । सूर्यो जातः कश्यपाच्च सूर्यपुत्रो मनुस्तथा ॥ 9 ॥ मनोश्चैक्ष्वाकुरुत्पन्नस्ततश्च कुक्षिसम्भवः । कुक्षिपुत्रो विकुक्षिश्च विकुक्षेर्वेनसम्भवः ॥ 10 ॥ पितामह ब्रह्मा के पुत्र मरीचि हुए। मरीचि के कश्यप हुए जो मुनि हुए। कश्यप मुनि के सूर्य हुए और सूर्य के पुत्र मनु हुए। मनु के इक्ष्वाकु उत्पन्न हुए और इक्ष्वाकु के कुक्षिवान् हुए। कुक्षिवान के विकुक्षि हुए जबकि विकुक्षि के वेन नामक राजा हुआ।¹
- चन्द्रगुप्त वेदालङ्कार ने अपने 'बृहत्तरभारत' में मेसोपोटामिया के सुमेर राजवंश और भारत के सूर्यवंशी राजवंश का एक तुलनात्मक परिचय देते हुए लिखा है कि सुमेर-सुराष्ट्र भारत से गए व्यापारी थे जिनके इतिहास में भारतीय राज्य के रूप में मेसोपोटामिया समाहित हुआ। इसी से वहाँ की वंशावली भारतीय वंशावली ही है:— सुमेरिया की वंशावली भारत की सूर्यवंशावली 1.................... 1. वैवस्वत मन
सूत्र- १७ 75 वेनो नाम महाराजो महावीर्यो महाबलः । शरीरमथनात्तस्य तथा पृथुः समुद्भवः ॥ 11 ॥ पृथुश्चैवं समुद्भूतस्तथा ख्यातः कुलाधिपः । रामश्च रघुवंशोऽभूत् सूर्यवंशे महाबलः ॥ 12 ॥ उक्त वेन नामक महाराजा महा पराक्रमी और महाबली थे। इनके शरीर के मन्थन से पृथु का जन्म हुआ। पृथु से कई एक विख्यात राजा इस कुल में हुए। सूर्यवंश में महा बलवान रघुवंश में राम का जन्म हुआ। इत्यमनन्तरकेत्वादीनामाह — सूर्यपुत्रः शनिजीतः केतुकश्च समुद्भव ?। अष्टोत्तरशतं₁₀₈ चैव केतुकश्च ब्रह्मकोद्भवः ?( दण्डकौः ) ॥ 13 ॥ शम्भुतेजोभवं चोध्वं दृश्यते ज्ञानचक्षुषा। (अब केतु व ग्रहादि के विषय में कहा जा रहा है) सूर्य के शनि नामक पुत्र हुआ और केतु भी हुए। केतु ब्रह्मा से भी हुए। इनकी संख्या 108 हैं।¹ ये समस्त केतु शम्भू के तेज से ऊँचे आकाश में ज्ञानचक्षु से ही दिखाई देते हैं, सामान्य आँखों से नहीं। 2. उक्कुसी 2. इक्ष्वाकु 3. बकुस 3. विकुक्षि 4. पुनपुन 4. पुरञ्जय 5. (नक्ष) अनेना 5. अनेना (वेन)-पृथु.... राम यह अनेना ही मेसोपोटामिया में ओनेस नाम से और भारत में वेन नाम से पुराणों में विख्यात हुआ है। मेसोपोटामिया के बोगजकोई नामक स्थान पर वकुस (विकुक्षि) की विशाल मूर्ति चट्टान पर खुदी हुई है जिसके एक हाथ में गेहूँ की बाली और दूसरे हाथ में हल धारण किया हुआ है। यह आर्यों का कृषि प्रचार है। वहीं 1360 ई. पू. का मितन्नी राजा दशरथ और मिस्र के फराहों के बीच हुआ सन्धिनामा लिखा हुआ शिलालेख ह्यूगोविकलर को खुदाई करते हुए मिला था जिसमें आर्यदेवता- मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्य को साक्षी मानकर सन्धि की गई। ये लोग भारत से गए आर्य हैं। मोहनजोदाड़ा की खुदाई से भी यही लगता है। (बृहत्तरभारत, गुरुकुल कांगड़ी, 1939, पृष्ठ 470)
- नारदीय मयूरचित्रकम् में सूर्यपुत्र केतु का वर्णन आया है जो मोती व सोने के समान पचीस संख्या वाले, पूर्व या पश्चिम दिखाई देने वाले हैं जिनके उदय होने पर भय होता है— मुक्ता कनक संकाशाः पञ्चविंशतिसंख्यकाः। प्राक् परस्याञ्च ते दृष्टाः सूर्यपुत्राः भयप्रदाः॥ (1, 6) 'ब्रह्मकोद्भव' या 'ब्रह्मदण्डको' भी केतु माने गए हैं जो ब्रह्मा के पुत्र हैं और क्रूर, तीन रङ्गवाले और तीन शिखा वाले तथा क्षयकारी कहे गए हैं— क्रूरस्त्रिवर्णस्त्रिशिखः क्रूरो ब्रह्मसुतः स्मृतः। सर्वास्वाशासु संदृष्टो ब्रह्मदण्डः क्षयावहः॥ (तत्रैव 1, 11) ग्रन्थकार ने यहाँ ब्रह्मा के पुत्र केतुओं की संख्या 108 बताई है जबकि मयूरचित्रकम् में इनकी संख्या 204 दी गई है।
अथ पञ्चाङ्गलक्षणानि — नक्षत्रयोगा राशिश्च तिथयः करणादिकम् ॥ 14 ॥ तारकालिङ्गमित्युक्तं मातृमण्डलसम्भवम्। वैष्णवे च पदे चैव भ्राम्यतीत्थं ध्रुवावृतम् ॥ 15 ॥ नक्षत्र, योग, राशि, तिथियाँ और पाँचवाँ करण— ये सभी पञ्चाङ्ग कहे जाते हैं। इन सबको तारक नाम से कहा गया है और ये सभी मातृमण्डल से उत्पन्न हुए हैं। ये समस्त तारक विष्णु के पद से ध्रुववृत्त के चारों ओर भ्रमणरत हैं। ग्रहनामादीनां — दिवाकरः शशाङ्कश्च भौमश्च बुध एव च। त्रिदशाचार्यशुक्रौ च शनिश्च राहुकेतुकौ ॥ 16 ॥ सूर्याद्यं च समं त्वेवं ध्रुवग्रहादिकं तथा। भ्राम्यति दक्षिणावर्तमचाल्यं ध्रुवसत्पदम् ॥ 17 ॥ सूर्य, चन्द्र, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहू और केतु ये ग्रह कहलाते हैं। सूर्य से लेकर सभी ग्रह समान रूप से अचल ध्रुव के चारों ओर प्रदक्षिणा क्रम से भ्रमण करते हैं। प्रदक्षिणं तथर्क्षाणां सम्पूर्णा सप्तविंशतिः₂₇। ऋक्षमध्ये यथा राशौ ग्रहास्तिथ्यादयस्तथा ॥ 18 ॥ चारः क्रामति योगेन मेरुमावृत्य दक्षिणम्। प्रदक्षिणा करने वाले सम्पूर्ण नक्षत्रों की संख्या 27 है। इन्हीं नक्षत्रों के बीच में ग्रह राशियाँ, तिथियाँ आदि होती हैं। ये सब मेरु पर्वत को दक्षिणावर्त करके विविध योगों में भ्रमण या चार करते हैं। तत्रैव मण्डलपृथुत्वञ्च बिम्बमानमाह — मण्डलानि पृथुत्वं च बिम्बमानं च कथ्यते ॥ 19 ॥ क्षारार्णवोदकं भूमौ कथ्यते ग्रहमण्डलम्। योजनैर्व्योमसङ्ख्यातं कथयामि समासतः ॥ 20 ॥ अब मैं इनके मण्डल, प्रसार और बिम्बमान आदि के विषय में कहूँगा। भूमि पर लवणीय समुद्र के बारे में, ग्रहमण्डल के बारे में और असंख्य योजन की दूरी तक व्यास इस व्योम आकाश के बारे में भी संक्षेप से कहूँगा। चतुर्दशलक्षाणां च योजनानां तु सङ्ख्यया।
सूत्र- २७ ११ ध्रुवचक्रसमुत्थाध्वा चक्षुर्ज्ञानेन व्योम्नि च ॥ २१ ॥ समलक्षार्धमादित्यं सहस्राणां द्विसप्ततिः। भूमिक्षारार्णवोर्ध्वं च योजनान्यर्कमण्डलम् ॥ २२ ॥ ब्रह्माण्ड के इस व्योमाकाश में चौदह लाख योजनों की संख्या तक असंख्य ध्रुवचक्र (निहारिकाएँ) फैले हुए हैं जो खुली आँखों से दिखाई देते हैं (अर्थात् दृग्गणित ज्योतिष के विषय हैं, दूरवीक्षण यन्त्रों की सहायतासे दिखाई सकने वाले ध्रुवचक्रों की तो बात नई नहीं है)। इन दिखाई देने वाले ध्रुवमण्डलों में साढ़े सात लाख तो आदित्य हैं, जो इस लवणीय समुद्र के ऊपर चौदह हजार योजनों की ऊँचाई पर स्थित अर्कमण्डलों अर्थात् सूर्यलोकों में फैले हुए हैं। तत्परं चन्द्रमण्डलं पञ्चाशतसहस्रैः स्थितम्। अष्टाशीतिसहस्राणि भौमोर्ध्वं भौमसंस्थितिः ॥ २३ ॥ इनके परे चन्द्र मण्डल अर्थात् चन्द्रलोक है जो पचास हजार योजनों की दूरी पर स्थित है। इसी तरह चन्द्र मण्डल के ऊपर अठासी हजार योजन दूरी पर मङ्गल मण्डल की स्थिति है। लक्षं त्रिषष्टिसहस्राणि भौमोर्ध्वं बुधमण्डलम्। चतुर्विंशसहस्राणि बुधोर्ध्वं च बृहस्पतिः ॥ २४ ॥ एक लाख तिरसठ हजार योजनों की दूरी पर स्थित, भौममण्डल से ऊपर बुध मण्डल है और बुध मण्डल से चौबीस हजार योजन ऊपर बृहस्पति मण्डल है। सूर्योर्ध्वं चैव लक्षार्द्धं शुक्रस्य मण्डलं विदुः। शुक्रलोकात्तथा चोर्ध्वं षट्षष्टिभिः सहस्रकैः ॥ २५ ॥ सूर्यतश्च परे ख्यातः सूर्यपुत्रशनैश्वरः। सूर्य के ऊपर आधे लाख योजन की दूरी पर शुक्र का मण्डल विद्यमान है। शुक्रलोक से ऊपर, छासठ हजार योजन दूरी पर सूर्य से परे सूर्यपुत्र शनैश्वर का मण्डल विख्यात है। सूर्याधः षष्टिसहस्रै राहुमण्डलमास्थितम् ॥ २६ ॥ रवेः समन्तात् केतुश्च रथपृष्ठेऽनुगच्छति। शतकोटियोर्जनानां ब्रह्माण्डम्य प्रमाणकम् ॥ २७ ॥ इसी प्रकार सूर्य से नीचे, साठ हजार योजन पर राहुमण्डल स्थित है और रवि या सूर्य के अन्त में साथ-साथ सूर्यरथ के पीछे-पीछे केतु जाता है। इस प्रकार इस ब्रह्माण्ड का विस्तार प्रमाण सौ करोड़ योजनों का है।
मेरुलिङ्गं समाख्यातं पृथ्वी च जलधारिका। वितानं व्योमचाख्यातं लम्बतीत्थमुमापतिः ॥ २८ ॥ भूमण्डल में मेरु पर्वत शिवलिङ्ग के समान आख्यात है और यह पृथ्वी उस शिवलिङ्ग की जलधारिक स्वरूप है, यह व्योमाकाश विशाल वितान के रूप में आख्यात है जिसमें उमापति महेश्वर लाम्बायमान रूप में मेरु स्वरूप स्थित है। ध्रुवमण्डलमुत्पन्नं ब्रह्माण्डाकाररूपकम्। तारामण्डलमित्युक्तं कथ्यते तच्च सङ्ख्यया ॥ २९ ॥ सप्तदशार्बुदमेव लक्षाणां षष्टिरेव च। षष्टिश्च तारकायुक्तं खङ्ख्यातं ध्रुवमण्डलम् ॥ ३० ॥ अरुन्धती विष्णुपदी सप्तर्षयस्तथोत्तमाः। ध्रुवाद्यं तारकालिङ्गमेतेषां बाह्यतो ध्रुवम् ॥ ३१ ॥ ध्रुव मण्डल में ब्रह्माण्डाकार रूप में जो तारा मण्डल कहा गया है, उसकी संख्या सत्रह अरब, साठ लाख और साठ तारों के साथ संख्या वाला यह ध्रुव मण्डल है। अरुन्धन्ती, विष्णुपदी, सप्तऋषि उत्तम और ध्रुव से आरम्भ होने वाले समस्त तारक लिङ्ग है जो ध्रुव के बाहर की ओर है अर्थात् ध्रुव केन्द्र में है। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्त श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ग्रहादिध्रुवमण्डलाधिकारो नाम सप्तदश सूत्रम् ॥ १७ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ग्रहादि ध्रुवमण्डल अधिकार नामक सत्रहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ १७ ॥ ग्रहगतिमानमुहूर्तादिप्रमाणमष्टादश सूत्रम् ॥ १८॥ अपराजित उवाच - कथितानि मण्डलानि ध्रुवादेर्ग्रहसङ्ख्यया। अतस्तेषां पुनस्त्वेवं बिम्बमानं निबोधय ॥ १ ॥ बिम्बमानगतिश्चैव ग्रहाद्याः क्रमयोगतः। भ्रमन्ति दक्षिणावर्ते ह्यध्वनि स्वप्रमाणतः ॥ २ ॥ तिथिसङ्ख्याप्रमाणं च पक्षमासौ तथैव च। ऋतुकालं वत्सरांश्च कथयस्व समासतः ॥ ३ ॥ अपराजित बोले - ध्रुवादि ग्रह मण्डलों की संख्या आपने कही, अब पुनः कृपा करके उनके बिम्बमानों के बारे में भी कुछ बताएँ। ग्रहों के क्रमवार बिम्बमान
सूत्र- १८ 79 और गति बताते हुए उनके किसी भी प्रकार की ध्वनि किए बिना अपने आप स्व प्रमाणतः दक्षिणावर्त भ्रमण करने के बारे में भी कहिए। हे प्रभो! तिथियों की संख्या, प्रमाण, पक्ष, मास, ऋतुकाल, वर्ष आदि के बारे में भी संक्षेप से बताइए। विश्वकर्मोवाच – बिम्बमानं ततस्तात शृणुचैकाग्रमानसः। अनुक्रमेण कथये सूर्यादीनामथोऽधुना॥ ४॥ सूर्यादीनां ग्रहाणां तु कथ्यन्ते बिम्बकानि तु। वृत्तव्यासौ बिम्बमाने कथयामि समासतः॥ ५॥ विश्वकर्मा कहने लगे – हे तात! मैं सूर्यादि से लेकर अभी तक के बिम्बमानों के बारे में अनुक्रम से कहता हूँ जिसे तुम एकाग्र मन से सुनो। सूर्यादि ग्रहों के बिम्बों के वृत्त और व्यास तथा उनके बिम्बमानों को संक्षेप से कहता हूँ। सूर्यादिग्रहाणां बिम्बप्रमाणमाह – षट्सहस्रपञ्चशतयोजनैः स्याच्च विस्तरः। सूर्यबिम्बप्रमाणं तु विद्युत्कोटिसमप्रभम्॥ ६॥ सूर्य के बिम्बमान का विस्तार छह हजार पाँच सौ योजन का है और उसकी प्रभा अर्थात तेज चमक करोड़ों विद्युत तड़ितों के समान है। चतुर्भिंश्च सहस्राणां द्व्यष्टाशीत्या च योजनैः। सोमबिम्बप्रमाणं तत् सुधातेजः समुद्भवम्॥ ७॥ चन्द्रमा का बिम्बमान चार हजार अठासी योजनों का है, उससे अमृत रूपी तेज निकलता रहा है। भौमस्य बिम्बमानं तु पृथु योजनविंशतिः। बुधस्य बिम्बमानं च विस्तृतं शतयोजनैः॥ ८॥ मङ्गल के बिम्बमान का प्रमाण बीस योजन के विस्तार का है और बुध के बिम्बमान का प्रमाण एक सौ योजन के विस्तार में है। द्वाचत्वारिंशश्च सार्ध गुरुबिम्बं प्रमाणतः। पञ्चसप्ततिः शुक्रस्य शतार्धं पञ्च वै शनैः॥ ९॥ साढ़े बयालीस योजन गुरु का बिम्बमान है और पिचहत्तर योजन शुक्र का बिम्बमान है। इसी प्रकार पचपन योजन का बिम्बमान शनि ग्रह का कहा गया है। अष्टसहस्रयोजनप्रमाणं राहुमण्डलम्।
80 अपराजितपृच्छा केतोश्च भौमतुल्यं स्यात् कथितं च प्रमाणतः ॥ 10 ॥ इसके अतिरिक्त राहु मण्डल का प्रमाण आठ हजार योजन का है तथा केतु का बिम्बमान मङ्गल के तुल्य अर्थात् बीस योजन का है। यह मैंने प्रमाणतः कहा है। ध्रुवस्य प्रदक्षिणागतिक्रमाह — गतिक्रमं च वक्ष्याति ध्रुवमेकं प्रदक्षिणम्। योजनैश्च गतिस्त्वेवं गम्यते च प्रदक्षिणम् ॥ 11 ॥ अब मैं ध्रुव की एक प्रदक्षिणा के गतिक्रम तथा प्रदक्षिणा में जाते समय की उनकी योजनों में होने वाली गति के बारे में कहता हूँ। निमिषे द्विशतं भानुः ग्लौः सार्धद्विसहस्रकम्। त्रयस्त्रिंशदधिकशतयोजनैर्भौमगतिः ॥ 12 ॥ बुधश्च सूर्यमानेन भ्रमति ध्रुवदक्षिणम्। गुरुश्च क्रमते चैव योजनैर्दशपञ्चभिः ॥ 13 ॥ शुक्रसूर्यगतिश्चैव द्विशतं निमिषान्तरे। समयोजनत्रिभागं निमिषात्तु शनैश्चरः ॥ 14 ॥ योजनरकादशभी राहोश्च निमिषे गातः। केतुर्भानोः समन्ताच्च भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 15 ॥ निमिष में सूर्य की गति दो सौ योजन और ग्लौ (चन्द्रमा) की एक निमिष में ढाई हजार योजन गति होती है। एक निमिष में ही मङ्गल की गति एक सौ तैतीस योजन की होती है। बुध की गति सूर्य के मान के बराबर एक निमिष में दो सौ योजन होती है जो ध्रुव के दक्षिण में भ्रमण करता है। गुरु की भ्रमण गति भी एक निमिष में पन्द्रह योजन की होती है। शुक्र की भी सूर्य की गति के समान ही एक निमिष में दो सौ योजन की होती है तथा शनि की गति एक निमिष में पौने आठ योजन की होती है। इसी प्रकार राहु की गति एक निमिष में ग्यारह योजन और केतु का गतिमान भी राहु के समान ही ग्यारह योजन प्रति निमिष होता है जो दक्षिणावृत्त में भ्रमण करता है। आमध्याह्नमुदयतो ह्यष्टधा च दिनार्धकम्। चत्वारिंशत्त्वेकहीनं सहस्राण्याद्यसङ्क्रमे ॥ 16 ॥ सूर्योदय से मध्याह्न तक अष्टधा अर्थात् दिनार्द्ध होता है। इस अवधि से चालीस से एक कम अर्थात् उनतालीस हजार संक्रमण सूर्योदय से मध्याह्न तक होते हैं।
सूत्र-१८ 81 तदूर्ध्वं च षड्विंशत्या त्वेकत्रिंशत् सदा क्रमः। चतुर्विंशतिरूपर्ध्वे तु दशपञ्च तथोत्तरे ॥ 17 ॥ इससे ऊपर छब्बीस से लेकर इकतीस तक के सदाक्रम में, चौबीस से ऊपर पन्द्रह, इस प्रकार कुल उनतालीस उत्तर में भी होते हैं। अग्रे गतिश्च दशभिः पञ्चभिर्मध्यमाश्रिते। त्रिभिः सहस्रैर्मध्याह्ने योजनैर्गतिमादिशेत् ॥ 18 ॥ इसके आगे की गति दस और पाँच के मध्य आश्रित रहती है। तीन हजार योजन की गति मध्याह्न तक (आदिशेत्) कही गई है। पूर्वाह्ने च गतिं ज्ञात्वा विपरीता परेऽहनि। एवं क्रमैः युक्तियोगो ग्रहाणां च गतिस्तथा ॥ 19 ॥ पूर्वाह्न की गति जानने पर उससे विपरीत करके अपराह्न की गति लानी चाहिए। इस क्रम से युक्तियोग और ग्रहों की गति लाई जाती है। भुक्तिमानं गतिश्चैवं सूर्यादिग्रहमण्डले। प्रयुक्तश्च ध्रुवो मध्ये भ्रमते दक्षिणावृतम् ॥ 20 ॥ सूर्यादि ग्रह मण्डल में जितनी गति भुक्तिमान हुई है, उसे प्रयुक्त करके वे ध्रुव के मध्य में दक्षिणावृत्त में भ्रमण करते हैं। प्रदक्षिणीकृते तस्मिनहोरात्रमितिस्मृतम्। प्रदक्षिणार्द्धमावृत्ते दृष्टे सूर्ये तथा दिवि ॥ 21 ॥ तथा रात्रिरथाख्याता सूर्ये चादृष्टतां गते। तस्यैव षष्टिकांशस्तु₆₀ प्रोच्यते घटिकाभिधा ॥ 22 ॥ इस प्रकार के प्रदक्षिणा करने से इससे अहोरात्र अर्थात दिन-रात की संज्ञा से स्मरण किया जाता है। प्रदक्षिणा की अर्ध आवृत्ति में जब तक सूर्य दिखाई देता है, तब तक दिन कहा जाता है तथा सूर्य के अदृष्ट हो जाने पर (प्रदक्षिणा की दूसरी अर्ध आवृत्ति को) रात्रि कहा जाता है। इसी दिन और रात का साठवाँ अंश घटिका के नाम से जाना जाता है। ताभिर्दिनं षष्टिभिश्च मासस्त्रिंशद्दिनैर्भवेत्। घटिकाषष्टिपलैर्निमेषः पञ्चदशपलैः ॥ 23 ॥ ऐसी साठ-साठ घटियों के योग से बनने वाले तीस दिनों का मास बनता है और घटिका साठ पल की तथा निमेष पन्द्रह पल का होता है।
82 अपराजितपृच्छा निमेषषोडशांशस्तु कला कलार्धं लम्बकः । लम्बकार्धे लम्बकाक्ष्यो लम्बकार्धे पादैस्त्रिभिः ? ॥ २४ ॥ निमेष के सोलहवें अंश को कला कहते हैं और आधी कला को लम्बक तथा लम्बक का आधा लम्ब और लम्ब का आधा पाद होता है। तीन पाद से ? उभौ करगृहीत अलम्बं त्रुटिशब्दतः ? । द्वे घट्यौ च मुहूर्तं स्यात् लग्नं पञ्चघटीभवम् ॥ २५ ॥ दोनों हाथों से अलम्ब त्रुटि शब्द से जाना जाता है ? दो घटी का मुहूर्त होता है और पाँच घटी का लग्न होता है।¹ सूर्यादि सप्तवाराश्च क्रमेण तिथयस्तथा । एवं प्रोक्तं मुहूर्तादि ह्यहोरात्रादिमध्यतः ॥ २६ ॥ क्रमयुक्तिर्विधातव्या कालसङ्ख्यामतः परम् । सूर्यादि से शुरू करते हुए सात (रविवार, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि) वार होते हैं और एक के क्रम से (पन्द्रह तक) तिथियाँ होती हैं। इस प्रकार से दिन और रात के मध्य मुहूर्त आदि कहे गए हैं। ऐसा क्रम युक्ति से बनाना चाहिए। इसके परे काल संख्या को कहा जाएगा। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्ता०-जितपृच्छां ग्रहगतिमान मुहूर्तादिप्रमाणनिर्णयाधिकारेऽष्टादश सूत्रम् ॥ १८ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ग्रहगतिमान मुहूर्तादि प्रमाण निर्णय अधिकार नामक अठारहवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ १८ ॥ तिथिमासर्तुकालसंवत्सरो नामैकोनविंशं सूत्रम् ॥ १९॥ अपराजित उवाच - कालसङ्ख्या कथं देव ह्यष्टयामादिकं तथा । तिथिसंवत्सराद्यं च कथयस्व प्रसादतः ॥ १ ॥ संवत्सराभिधानानि पृथक् चैवं प्रमाणतः ।
- विष्णुपुराण में 15 निमेष की 1 काष्ठा तथा 30 काष्ठा की 1 कला और 30 कला का 1 मुहूर्त कहा गया है, 30 मुहूर्त का 1 दिन एवं रात्रि बताई गई है और 30 अहोरात्र का एक मास कहा है- काष्ठापञ्चदशाख्याता निमेषा मुनिसत्तम। काष्ठा त्रिंशत्कला तास्ता त्रिंशन्मौहूर्तिको विधिः ॥ तावत्संख्यैरहोरात्रं मुहूर्तैर्मानुषं स्मृतम्। अहोरात्राणि तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ॥ तैः षड्भिरयनं वर्षं द्वेऽयने दक्षिणोत्तरे। अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम्॥ (अंश 1, 3, 8-10)
सूत्र-१९ 83 कथयस्व प्रसादेन विश्वेश जगतांपते ॥ २ ॥ अपराजित बोले — हे देव ! अष्टयामादिक काल संख्या कितनी है, आप कृपा करके तिथि, संवत्सरादि उन सबको कहें। सभी संवत्सरों के नामों को प्रमाणपूर्वक पृथक्-पृथक् समझाएँ। हे जगत्पते ! विश्वेश !! इस बारे में आपका कृपा-प्रसाद चाहिए। विश्वकर्मोवाच — अहोरात्रादितः सङ्ख्या दृष्टे सूर्योदये मता । अष्टौ यामाश्च सम्प्रोक्ता अहोरात्रसमुद्भवाः ॥ ३ ॥ जयो विजय आख्यातो महाशङ्कश्च शङ्कुकः । उदयाद्धि समाख्याताश्चत्वारश्च निशापतेः ॥ ४ ॥ विश्वकर्मा ने कहा — दिन-रातों की संख्या सूर्य के उदय होने के साथ देखकर मानी गई है। इन दिन-रातों में आठ याम होते हैं, ऐसा पहले (सूत्र 18) कहा गया है। उदयात् ही से निशापति या चन्द्रमा के चारों (1.) जय, (2.) विजय, (3.) महाशङ्कु, और (4.) शङ्कुक ये (याम) कहे गए हैं। अथ तिथ्यादीनामाह — अहोरात्रैस्तिथेर्नाम प्रोक्तं नन्दादिपञ्चकम् । नन्दा भद्रा जया रिक्ता पूर्णा वै पञ्चमी स्मृता ॥ ५ ॥ पञ्च पञ्च पुनः पञ्च मासार्धे तिथयस्तथा । तिथिभिः पञ्चदशभिः पक्षो मासो द्विपक्षतः ॥ ६ ॥ दिन-रातों के तिथियों के नाम नन्दादि पाँच क्रम से कहे गए हैं— नन्दा (1, 6, 11), भद्रा (2, 7, 12), जया (3, 8, 13), रिक्ता (4, 9, 14) और पाँचवीं पूर्णा (5, 10, 15, 30) तिथियाँ हैं। इस प्रकार मासार्ध में ये पाँच-पाँच और पाँच तीन बार तिथियाँ होती हैं। ऐसी पन्द्रह तिथियों से पक्ष या पखवाड़ा बनता है और दो पक्षों से एक मास होता है। तथा च स्पष्टाह— आदौ नन्दादिकश्चैवं कालः स्याद् दशपञ्चभिः$_{15}$ । नन्दा प्रतिगदा$_1$ ज्ञेया द्वितीया$_2$ भद्रिका मता ॥ ७ ॥ तृतीया$_3$ च जया रिक्ता चतुर्थी$_4$ सम्प्रकीर्तिता । तिथिः पूर्णा पञ्चमी$_5$ स्यादेवं हि तिथयो मताः ॥ ८ ॥
84 अपराजितपृच्छा षष्ठी₆ च सप्तमी₇ चैव ह्यष्टमी₈ नवमी₉ तथा। दशम्ये₁₀कादशी₁₁ चैव द्वादशी₁₂ च त्रयोदशी₁₃ ॥ ९॥ चतुर्दशी₁₄ पौर्णमासी₁₅ तिथयश्चन्द्रसम्भवाः। चन्द्रस्तु षोडश₁₆कलस्तिथयो दशपञ्चभिः₁₅ ॥ १० ॥ नन्दादिक से आदि करके काल पन्द्रह होते हैं। प्रतिपदा को नन्दा, द्वितीया को भद्रा, तृतीया को जय, चतुर्थी को रिक्ता और पञ्चमी को पूर्णातिथि कहा जाता है, और ऐसे ही आगे (इसी क्रम से षष्ठ्यादि से न्यास करने पर) अन्य तिथियाँ होती है। षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णमासी तिथियाँ चन्द्रमा से बनती है। चन्द्रमा की सोलह कलाएँ हैं और तिथियाँ पन्द्रह हैं। षोडशचन्द्रकलामाह — शशिनी शान्तिनी चैव लक्ष्मणी कामिनी तथा। पुषिणी च शुभा शान्ता चाह्लादा कुमुदा तथा ॥ ११ ॥ शस्याशिनी मानिनी च तथा विद्याविशोधिनी। महिषी द्वीपिनी सौम्या चामृता षोडशी तथा ॥ १२ ॥ चन्द्रमा की सोलह कलाएँ इस प्रकार हैं— (1.) शशिनी, (2.) शान्तिनी, (3.) लक्ष्मणी, (4.) कामिनी, (5.) पुषिणी, (6.) शुभा, (7.) शान्ता (8.) आह्लादा, (9.) कुमुदा, (10.) शश्याशिनी, (11.) मानिनी, (12.) विद्या विशोधिनी, (13.) महिषी, (14.) द्वीपिनी, (15.) सौम्या और सोलहवीं (16.) अमृता। सितपक्षे वर्द्धते च क्षीयते कृष्णपक्षके। पूर्णिमा पूर्णचन्द्रेऽमावास्या क्षीणविधौ स्मृता ॥ १३ ॥ शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कलाएँ बढ़ती हैं और कृष्णपक्ष में घटती जाती हैं। पूर्णचन्द्र होने पर पूर्णिमा कही जाती है और चन्द्रमा के क्षीण हो जाने को अमावस्या कहा जाता है। मासनामानि — पूर्णमासे उभौपक्षावथ मासाभिधेयकम्। कार्त्तिको मार्गशीर्षश्च पौषो माघोऽथ फाल्गुनः ॥ १४ ॥ चैत्रौ वैशाखज्येष्ठौ च ह्याषाढश्चैव श्रावणः।
सूत्र-१९ 85 पूर्णमास दो पक्षों का होता है। इसे ही मास का नाम दिया गया है। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन— ये बारहों मासों के नाम हैं। कार्तिक्यात्षडृतुवः — कार्तिकाद्या द्वादशस्युर्याभ्यां द्वाभ्यामृतूद्भवः । अभिधानानि कथये षडृतूनामनुक्रमात् ॥ 16 ॥ कार्तिक आदि से आरम्भ करके बारहों मास में दो-दो मास की ऋतुएँ होती हैं। इन षट् ऋतुओं के नाम अनुक्रम से कहता हूँ— वसन्तग्रीष्मौ वर्षाश्च शरद्धेमन्त एव च। शिशिरश्च षडृतवश्चैत्रिकादिद्विमासकाः ॥ 17 ॥ (1.) वसन्त, (2.) ग्रीष्म, (3.) वर्षा, (4.) शरद, (5.) हेमन्त और (6.) शिशिर— ये दो-दो मास की ऋतुएँ चैत्रादि मास से क्रमशः होती है। वार्षिकात्मकद्वैर्तुकालमाह — द्वौ ऋतू भवतः कालः शीतोष्णवार्षिकात्मकः। दो ऋतुओं का काल भी होता है जो एक वर्ष में शीत और ग्रीष्म ऋतु दो नामों से जाना जाता है। त्र्यर्तुकालमाह — कीर्तिकादिभवः शीतो ग्रीष्मः फाल्गुनतः स्मृतः ॥ 18 ॥ तथाषाढादितः प्रावृट् सर्वबीजहितात्मिका । एवं स्यात् त्रिविधः कालः शीतोष्णप्रावृडात्मकः ॥ 19 ॥ कार्तिक से आरम्भ होने वाले को शीत एवं फाल्गुन से आरम्भ होने वाले काल को ग्रीष्म कहते हैं तथा आषाढ़ से आरम्भ होने वाली ऋतु को प्रावृट् या वर्षाकाल कहा जाता है जो कि समस्त बीजों के लिए हितकारी है। इस तरह शीत, ग्रीष्म और वर्षाकाल— ये तीन काल होते हैं। कालत्रयं षडृतबो माससङ्ख्यातु द्वादश₁₂ । चतुर्विंशति₂₄ पक्षाश्च षष्ठ्युत्तरशतत्रयम्₃₆₀ ॥ 20 ॥ दिनानि स्युस्तथा चैवं वर्ष चैव प्रवर्तते । इत्यादियुक्तियोगेन प्रोक्तः संवत्सराभिधः ॥ 21 ॥ जैसा कि कहा गया है कि काल तीन हैं, ऋतुएँ छह हैं और मास बारह हैं जबकि पक्ष चौबीस। इनमें सामान्यतः तीन सौ साठ दिन होते हैं। इतने ही दिनों से
86 अपराजितपृच्छा अर्थात् तीन सौ साठ दिनों से (सौर) वर्ष बनता है¹ और इस तरह पूरे युक्तिक्रम से संवत्सर के नामों को बताया गया है। अथ प्रभवादिशष्ठिसंवत्सरनामानि — संवत्सराभिधानानि षष्टिः स्युः प्रभवादितः । प्रभवो विभवश्चैव शुक्लो मोदः प्रजापतिः ॥ २२ ॥ अङ्गिराः श्रीमुखो भावो युवा धाता तथेश्वरः । बहुधान्यः प्रमाथी च विक्रमो वृष एव च ॥ २३ ॥ चित्रभानुः सुभानुश्च तारणः पार्थिवो व्ययः । सर्वजित्सर्वधारी च विरोधी विकृतिः खरः ॥ २४ ॥ नन्दनो विजयो जयो मन्मथो दुर्मुखस्तथा । हेमलम्बो विलम्बश्च विकारी शर्वरी तथा ॥ २५ ॥ प्लवश्च शुभकृच्चैव शोभनः क्रोधनस्तथा । विश्वावसुः पराभवः प्लवङ्गः कीलको मतः ॥ २६ ॥ सौम्यः साधारणश्चैव तथैवं च विरोधकृत् । परिधावी प्रमादी च ह्यानन्दो राक्षसोऽनलः ॥ २७ ॥ पिङ्गलः कालयुक्तश्च सिद्धार्थो रौद्रदुर्मती । दुन्दुभी रुधिरोद्गारी रक्ताक्षी क्रोधनः क्षयः ॥ २८ ॥ इत्थं संवत्सराणां च षष्ठीभेदाः प्रकीर्तिताः । प्रभवादि से कुल साठ संवत्सर होते हैं जिनके नाम क्रमशः निम्न हैं— (1.) प्रभव, (2.) विभव, (3.) शुक्ल, (4.) मोद, (5.) प्रजापति, (6.) अङ्गिरा, (7.) श्रीमुख, (8.) भाव, (9.) युवा, (10.) धाता, (11.) ईश्वर, (12.) बहुधान्य, (13.) प्रमाथी, (14.) विक्रम, (15.) वृष, (16.) चित्रभानु, (17.) सुभानु, (18.) तारण, (19.) पार्थिव, (20.) व्यय, (21.) सर्वजित्, (22.) सर्वधारी, (23.) विरोधी, (24.) विकृत, (25.) खर, (26.) नन्दन, (27.) विजय, (28.) जय, (29.) मन्मथ, (30.) दुर्मुख, (31.) हेमलम्ब, (32.) विलम्ब, (33.) विकारी, (34.) शर्वरी, (35.) प्लव, (36.) शुभकृत्, (37.) शोभन, (38.) क्रोधी, (39.) विश्वावसु, (40.) पराभव, (41.) प्लवङ्ग, (42.)
- कुल 360 दिन का सौर वर्षमान होता है। ज्योतिर्विदाभरण में आया है ; सौरा नभो₀ऽङ्गा₆ग्नि₃मितानी वासरा। (ज्योतिर्विदाभरण प्रथम प्रकरण, 25)